धन का नहीं धर्म का संचय करे : आचार्यश्री महाश्रमण

🔸जन जागृति की मशाल ले अहिंसा यात्रा उत्तर सालमारा के तुंगलिया गांव से बोइटामारी हायर सेकेण्ड्री स्कूल पहुंची🔸


आचार्यश्री महाश्रमणजी

21 दिसम्बर 2016 बोइटामारी, बंगाईगांव (असम) : अप्रैल महीन में बंगाईगांव मुख्यालय को पावन कर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता अपनी धवल सेना के साथ अप्रैल महीने में बंगाईगांव मुख्यालय को पावन करने के बाद गुवाहाटी में चतुर्मास परिसम्पन्न कर बार पुनः बंगाईगांव जिले के ग्रामीणों जिलों को अपने चरणरज से पावन कर रहे हैं और लोगों को मानवता का संदेश दे रहे हैं। 
इसी क्रम में मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ बुधवार की प्रातः बंगाईगांव जिले के उत्तर सालमारा के तुगंलिया गांव से विहार किया। लगभग चैदह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री बोइटामारी गांव पहुंचे। यहां स्थित बोइटामारी हायर सेकेण्ड्री स्कूल में प्रवास किया। 
विद्यालय परिसर में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आत्मा और शरीर दो चीजें है। आत्मा अलग और शरीर अलग है। जिस प्रकार मिट्टी में मिले रहने के बावजूद भी स्वर्ण का अस्तित्व अलग और मिट्टी का अस्तित्व अलग रहता है, उसी प्रकार शरीर और आत्मा एक साथ मिले रहने के बावजूद भी आत्मा का अस्तित्व अलग और शरीर का अस्तित्व अलग है। आत्मा शाश्वत, अनश्वर और स्थाई होती है तो वहीं शरीर अशाश्वत और नश्वर और अस्थाई है। धन-वैभव भी शाश्वत नहीं है, इसलिए आदमी को धन का धर्म का संचय करने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री ने कहा कि कोई आदमी मौत से नहीं बच सकता। आदमी छह खंडों का विजेता हो जाए तो भी जब उसकी मौत आएगी तो उसे कोई नहीं बचा सकता। आदमी अहंकार भले कर ले, किन्तु अपनी मौत को नहीं रोक पाएगा। मृत्यु के लिए प्राणी कीड़े के समान है। आदमी को जब भी अहंकार आए तो मौत को याद कर तो अहंकार कम हो सकता है। आदमी का धन-वैभव आगे नहीं जा सकता। आदमी खाली हाथ आया है और खाली हाथ जाएगा। इसलिए आदमी को धन-वैभव का ज्यादा मोह नहीं करना चाहिए। आदमी धन का नहीं धर्म का संचय करने का प्रयास करना चाहिए। आगे की गति को अच्छा बनाने के लिए सुकर्मों के माध्यम से धर्म का संचय करने का प्रयास करना चाहिए ताकि आगे भी अच्छा स्थान प्राप्त हो सके।


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