राग-द्वेष से मुक्त होकर वीतरागता की और बढ़ें : आचार्यश्री महाश्रमण

🔸शांतिदूत के दर्शन को पहुंचे उग्रविहारी, तपोमूर्ति संत मुनिकमलकुमारजी, आचार्यश्री ने स्वयं पट्ट से नीचे विराज की वन्दना, सुनाया मंगलपाठ, प्रदान किया मंगल आशीष🔸

आचार्यश्री महाश्रमणजी


          22 दिसम्बर 2016 चापड़, धुबड़ी (असम) : असम के विभिन्न जिलों को पावन करती अहिंसा यात्रा अपने प्रणेता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी व उनकी धवल सेना के साथ गुरुवार को बंगाईगांव जिले के धुबड़ी जिले की सीमा में मंगल प्रवेश किया। आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ धुबड़ी जिले के ब्लाक क्षेत्र चापड़ स्थित चापड़ हायर सेकेण्ड्री माॅडल स्कूल में पधारे। जहां आचार्यश्री का चापड़निवासीयों ने भावभरा स्वागत-अभिनन्दन किया। 
धुबड़ी जिले का चापड़ जहां आचार्यश्री के आगमन से खुश था वहीं दोपहर होते ही उसकी खुशी उस समय दोगुनी होई जब आचार्यश्री के श्रीमुख से उग्रविहारी, तपोमूर्ति की उपाधि प्राप्त मुनिश्री कमलकुमारजी का भी यहां आगमन हुआ। मुनिश्री कमलकुमारजी अररियाकोर्ट में चतुर्मास काल सम्पन्न कर आचार्यश्री के दर्शन को यहां पहुंचे। आचार्यश्री के समक्ष पहुंचते ही स्वयं आचार्यश्री से अपने से बड़े होने के नाते पट्ट से उतर कर नीचे विराज कर वन्दना करनी चाही, किन्तु आचार्य के प्रति निष्ठावान मुनिश्री ने अनुनय-विनय को शांतिदूत, महातपस्वी आचार्यश्री को पट्ट पर विराजमान कराया और खुद उनके चरणों में बैठ कर आशीष प्राप्त किया। मुनिश्री कमलकुमारजी ने इस आगमन को गुरुदृष्टि की कृपा बताते हुए कहा कि मेरे मन में असम देखने की भावना थी। कई लोगों मुझसे अर्ज करने को कहा, किन्तु मैंने कहा कि मेरे गुरु की भावना मुझसे जुड़ी हुई है और उनकी कृपादृष्टि होगी तो अवश्य ही मेरी इच्छा पूरी होगी। गुरु ने अपनी कृपा दृष्टि बरसाई और आज असम के दर्शन के साथ स्वयं के दर्शन देकर जीवन धन्य कर दिया। आचार्यश्री ने भी उन्हें शुभाशीष प्रदान किया और मंगलपाठ सुनाया। 
इसके पूर्व आचार्यश्री ने आज बंगाईगांव जिले के बोइटामारी से लगभग बारह किलोमीटर का विहार कर असम के धुबड़ी जिले की सीमा में प्रवेश किया। धुबड़ी जिले के ब्लाक क्षेत्र चापड़ स्थित चापड़ हायर सेकेण्ड्री माॅडल स्कूल में पहुंचे। आचार्यश्री ने विद्यालय के सांस्कृतिक हाॅल में उपस्थित श्रद्धालुओं को राग-द्वेष से मुक्त होकर वीतरागता की साधना करने का ज्ञान प्रदान करते हुए कहा कि अध्यात्म के साधना के क्षेत्र में वीतराग बन चुका व्यक्ति उच्चतम कोटि होता है। इसलिए आदमी को राग-द्वेष को कम कर वीतरागता की साधना करनी चाहिए। आचार्यश्री ने जैन तत्त्व विद्या के अनुसार चैदह गुणस्थान का वर्णन करते हुए कहा कि दसवें गुणस्थान तक वाला व्यक्ति वीतरागी नहीं हो सकता। बारहवें गुणस्थान वाला व्यक्ति स्थाई रूप से वीतराग बन सकता है। आचार्यश्री ने राग-द्वेष को कर्म का बीज बताते हुए कहा कि राग-द्वेष मुक्त आदमी सुखी बन सकता है। ईष्र्या-द्वेष से आदमी की आत्मा मलीन न होने पाए, इसका प्रयास करना चाहिए। ईष्र्या की भावना से बचने, दूसरों के प्रति मंगलभावना रखने तथा वीतरागता की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री के आगमन से हर्षित चापड़वासियों ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। इस क्रम में श्री बाबूलाल तातेड़ और श्री विकास सेठिया ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। वहीं चापड़ महिला मंडल ने भी गीत के माध्यम से अपनी भावांजलि श्री चरणों में अर्पित की। आचार्यश्री ने चापड़वासियों पर कृपा बरसाते हुए उन्हें सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) करवाई और उन्हें देव, गुरु और धर्म के प्रति आजीवन श्रद्धा, विश्वास और आस्था रखने के लिए संकल्पित कराया।


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