लोगस्स है 24 तीर्थंकरों की स्तुति : आचार्यश्री महाश्रमण

-भगवान् पार्श्वनाथ की जन्म जयंती पर आचार्यश्री ने अर्पित की श्रद्धा प्रणति-

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          23 दिसम्बर 2016 टीलापाड़ा, धुबड़ी (असम) : मानवता की मशाल जलाए जन-जन के मानस को प्रकाशित करने को निकले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ शुक्रवार को दक्षिण सालकोचा क्षेत्र के टीलापाड़ा गांव स्थित दक्षिण सालकोचा एमईस्कूल के प्रांगण में पहुंचे। जहां आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के जन्म जयंती पर विशेष अवगति प्रदान की और लोगस्स का पाठ सहित स्तुति के माध्यम से उन्हें श्रद्धा प्रणति अर्पित की। वहीं अपने सिंघाड़े के साथ चापड़ में आचार्यश्री के दर्शन करने वाले उग्रविहारी, तपोमूर्ति मुनि कमलकुमारजी और उनके सिंघाड़े के दो संत मुनि अक्षयप्रकाशजी तथा मुनि कोमलकुमारजी ने भी आचार्यश्री के आचार्यश्री के चरणों में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। 
जन मानस के हृदय को अंधकार की ओर ले जा रहे अमानवता के भाव को मिटाने और मानवता की की ज्योति जगाने को अहिंसा यात्रा लेकर हजारों किलोमीटर की पदयात्रा पर निकले अखंड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी शुक्रवार को प्रातः चापड़ से प्रस्थान किया। असम की शस्य-श्यामला धरा ने हृदयस्थल में उगाई गई सरसों की फसल के पीले पुष्पों से धानी चादर ओढ़ रखी थी। मानों वह मानवता के मसीहा का स्वागत कर रही हो। कहीं-कहीं कमल पुष्प भी खिले हुए थे। यह धानी चादर आज लगभग आचार्यश्री के पूरे विहार के दौरान बनी रही। बीच में कहीं-कहीं ईंट-भट्ठों पर ईंट निर्माण का कार्य भी चल रहा था और उनके आसपास रखे बंद डिब्बे में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय भी चल रहा था। आचार्यश्री लगभग सोलह किलोमीटर का प्रलंब और उबड़-खाबड़ रास्तों का विहार सम्पन्न कर धरती पर फैली धानी चादर के बीच स्थित गांव टीलापाड़ा पहुंचे। टीलापाड़ा स्थित दक्षिण सालकोचा एमई स्कूल में आचार्यश्री ने पदार्पण किया। आचार्यश्री के चरणरज से टीलापाड़ा और उक्त विद्यालय पावन हो गया। 
विद्यालय प्रांगण में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के जन्म जयंती पर विशेष अवगति प्रदान करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि पूरे भारत वर्ष में भगवान पार्श्वनाथ के प्रति लोगों का विशेष आकर्षण महसूस होता है। देश भर में यदि मंदिरों की गिनती की जाए तो शायद भगवान पार्श्व के मंदिर अधिक हो सकते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि अहिंसा यात्रा के दौरान जब दिल्ली से चले थे तो भगवान पार्श्व की जन्मस्थली वाराणसी भी गए। भगवान पार्श्वनाथ अधिकृत प्रवचनकार और पुरुषादानी विशेषण को प्राप्त हैं। आचार्यश्री ने इस अवसर पर लोगस्स के पाठ का महत्त्व बताते हुए कहा कि संतों के लिए इसका नियमित पाठ आवश्यक है। संवत्सरी के दिन तो चालीस लोगस्स का ध्यान आवश्यक होता है। इसमें चौबीस तीर्थंकरों की वंदना की गई है। आचार्यश्री ने फिर श्रद्धालुओं सहित एक लोगस्स का पाठ किया। आचार्यश्री ने इस प्रकार भगवान पार्श्वनाथ के जन्म जयंती पर अपनी अनंत-अनंत श्रद्धा अर्पित की। 
इसके उपरान्त अररियाकोर्ट में चतुर्मास सम्पन्न कर आचार्यश्री के दर्शन करने वाले संत मुनि कमलकुमारजी और उनके सिंघाड़े के दो अन्य संत मुनि अक्षयप्रकाशजी और मुनि कोमलकुमारजी ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी तथा एक गीत का भी संगान किया। आचार्यश्री ने आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि मुनि कमलकुमारजी अच्छा कार्य करने वाले और लोगों पर प्रभाव छोड़ने वाले संत हैं। वे खूब अच्छा काम करें, मंगलकामना।



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