मनुष्य जन्म का उठाएं सुन्दर लाभ : आचार्यश्री महाश्रमण

- बिलासीपाड़ा में दो दिवसीय प्रवास सम्पन्न कर गतिमान हुए शांतिदूत के चरण -  

आचार्यश्री महाश्रमणजी

         26 दिसम्बर 2016 बोगारीबाड़ी, धुबड़ी (असम), (JTN), आचार्यश्री महाश्रमणजी बिलासीपाड़ा में दो दिवसीय प्रवास सुसम्पन्न कर महासूर्य की भांति अपना आलोक दूसरे क्षेत्र को प्रकाशित करने के लिए निकल पड़े। सोमवार को प्रातः की मंगल बेला में आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ बोगारीबाड़ी की ओर प्रस्थान किया। नगर स्थित श्रद्धालुओं के आग्रह पर वत्सलता की प्रतिमूर्ति आचार्यश्री ने उनके घरों या प्रतिष्ठानों के समक्ष पहुंचकर उन्हें मंगलपाठ सुनाया और सभी को अपने शुभाशीष से अभिसिंचन प्रदान किया।
          विद्यालय के प्रांगण में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए आचार्यश्री ने फ़रमाया की मनुष्य जीवन का लाभ उठाकर मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग है। मनुष्य जीवन की जो पूंजी प्राप्त है, उसका लाभ उठाना चाहिए और अच्छे कर्मों के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने एक दृष्टांत के माध्यम लोगों को प्रेरित करते हुए कहा कि एक आदमी मरकर नरक या तिर्यंच गति में पैदा होता है, वह अपनी मनुष्यता की पूंजी को गंवा देता है। जो आदमी मरकर पुनः मनुष्य बनता है वह मनुष्यता की पूंजी को केवल बरकरार रखता है। 
           लेकिन जो आदमी अपने मनुष्य जन्म पूंजी का लाभ उठाता है और अच्छे कर्मों के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है वह इस पूंजी का पूर्ण लाभ प्राप्त कर लेता है। आदमी को अच्छे कर्म कर मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए और मानव जीवन रूपी पूंजी का पूर्ण लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए।
          आचार्यश्री ने मानव जीवन में भाग्य का महत्त्व बताते हुए कहा कि आदमी के जिन्दगी में भाग्य का बहुत बड़ा साथ होता है। भाग्य साथ न दे तो बड़े से बड़े लोग भी घुटने टेक देते हैं। पूर्वकृत पुण्य आदमी की रक्षा करते हैं। भाग्य पूर्वकृत पुण्यों का प्रतिफल होता है। आदमी के जीवन में पुण्यवत्ता न हो तो आधिपत्य प्राप्त करना या जीवन उच्चस्थ स्थान प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है। जीवन में पीछले जन्म के पुण्यों का चमत्कार भी दिखाई पड़ सकता है। इसलिए आदमी को अपने मानव जीवन का अच्छा उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को जीवन में ज्ञान का महत्व बताते हुए कहा कि ज्ञान पवित्र चीज है। ज्ञान का जीवन में परम महत्त्व है। ज्ञान का व्यवहार जगत में और धर्म के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वह मां शत्रु और पिता दुश्मन के समान होता है जो अपने बच्चों को शिक्षित नहीं करते, संस्कारित नहीं करते। अपने बच्चों को शिक्षित करना माता-पिता का फर्ज होता है। आदमी को जीवन में ज्ञानार्जन करने का भी प्रयास करना चाहिए।



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