मानव जीवन को शांतिमय बनाने के लिए धर्ममय आचरण करें - आचार्यश्री महाश्रमण

◆ देवचराई में आचार्यश्री महाश्रमण ने बहाई ज्ञानगंगा ◆

आचार्यश्री महाश्रमणजी

     06 जनवरी 2017 देवचराई, कूचबिहार (पश्चिम बंगाल) (JTN) पश्चिम बंगाल को पावन करने और जन-जन को मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए पदयात्रा कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरांपथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, मानवता के मसीहा, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी शुक्रवार को अपनी धवल सेना के साथ कूचबिहार जिले के देवचराई प्रखंड मुख्यालय स्थित देवचराई उच्च विद्यालय पहुंचे। आचार्यश्री ने विद्यालय प्रांगण में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन को शांतिमय बनाने का मंगल संदेश प्रदान किया। वहीं देवचराई सभापति श्री समन वर्मन ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं को की पुष्पांजलि अर्पित कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 
राज्य परिवर्तन के साथ ही मौसम परिवर्तन भी हो चुका है। पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश करते ही ठंड और कोहरे ने दस्तक दे दी है। शुक्रवार को भी जब आचार्यश्री प्रातः तूफानगंज से देवचराई की ओर विहार किया तो कोहरा अपने चादर से धरती को ढंक रखा था। कुछ दूरी के बाद से ही कुछ ही देख पाना मुश्किल हो रहा था। और ओस की बूंदे वृक्षों के पत्ते से टपक रहीं थी जो लोगों को बरसात का अहसास करा रही थी। समताभावी और अपने संकल्पों के प्रति दृढ़ अखंड परिव्राजक आचार्यश्री के ज्योति चरण बढ़े चले मानवता का संप्रसार करने। कोहरे ने अपनी चादर से भले आसमानी सूर्य को ढंक रखा था किन्तु धरती पर मानवता महासूर्य अपने पथ पर अपनी श्वेत रश्मियों के साथ गतिमान हो चुका था मानवता का आलोक बांटते हुए। ग्रामीण मार्ग पर लगभग बारह किलोमीटर के विहार के दौरान कई गांव के ग्रामीण आचार्यश्री के समक्ष उपस्थित होकर उनसे मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। सभी पर आशीषवृष्टि करते आचार्यश्री लगभगन नौ बजे देवचराई उच्च विद्यालय के प्रांगण में पहुंचे। 
विद्यालय प्रांगण में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित जैन और जैनेतर श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि अदर्शनी को ज्ञान नहीं मिलतां ज्ञान के बिना गुण की प्राप्ति नहीं होती और अगुणी, चरित्रहीन को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए आदमी का यथार्थ दर्शन होना चाहिए। ज्ञान की निरंतर वृद्धि कर अपने चरित्र को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आदमी को अपनी चेतना पर ध्यान देने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी धरती पर अकेला आता है, अकेला कर्मों का संचय करता है और उसका स्वयं फल भोगता है। इसलिए आदमी को मोह से मुक्त होकर अपनी आत्मा के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। कर्म अच्छा होगी तो आत्मा सुखी हो सकेगी और कर्म बुरा तो आत्मा दुःखी बन सकेगी। इसलिए आदमी अपने अच्छे कर्म करे और अपनी आत्मा मो कल्याण के पथ पर बढ़ाने का प्रयास करे तो उसकी आत्मा निर्मल और जीवन शांतिमय बन सकेगा। आचार्यश्री ने उपस्थित लोगों को जैन धर्म, और अहिंसा यात्रा के विषय में विशेष अवगति प्रदान की और लोगांे से अहिंसा यात्रा के तीनों संकल्पों को स्वीकार करने का आह्वान किया। आचार्यश्री के आह्वान पर कुछ ग्रामीणों ने सहर्ष तीनों कल्याणकारी संकल्पों को स्वीकार किया। 
देवचराई के सभापति श्री समन वर्मन ने अपनी मूल भाषा में आचार्यश्री का हार्दिक अभिनन्दन और स्वागत कर आचार्यश्री से शुभाशीष प्राप्त किया।




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