संघ के प्रति हो अटूट निष्ठा तो वर्धमान होता है संघ : आचार्यश्री महाश्रमण

- वर्धमान महोत्सव के दूसरे दिन आचार्यश्री ने संघ निष्ठा का पढ़ाया पाठ -

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          14 जनवरी 2017 कूचबिहार (पश्चिम बंगाल) (JTN) : आदमी के जीवन में शासन और संघ निष्ठा का बहुत महत्त्व है। यदि किसी साधु या श्रावक में संघ या शासन के प्रति निष्ठा का भाव न हो तो यह उसके जीवन की एक कमी हो सकती है। निष्ठा का अभाव या कमी आदमी के इस जीवन के साथ आगे के जीवन को नुकसान पहुंचाने वाली हो सकती है। इसलिए आदमी को संघ और शासन के प्रति अटूट निष्ठा और श्रद्धा का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। धर्मसंघ के प्रति एक सीमा तक कट्टरता का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। उक्त संघ और शासन को वर्धमान बनाने का मंगल सूत्र जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, प्रभावी प्रवचनकार, महातपस्वी संत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को कूचबिहार इण्डोर स्टेडियम में आयोजित वर्धमान महोत्सव के दूसरे दिन श्रद्धालुओं को प्रदान किया।
अहिंसा यात्रा के रूप में मानवीय मूल्यों की संस्थापना करने वाली ऐतिहासिक यात्रा के साथ पहली बार पूर्वोत्तर भारत की धरा को अपने चरणरज से पावन करने के उपरान्त पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले को अपने चरणरज से पवित्र कर दिया है। साथ ही अपनी ज्ञानगंगा के प्रवाह से लोगों के हृदय में सूख जुकी मानवता की फसल को अभिसिंचन प्रदान कर पुनः हरा-भरा बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं।
          तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्धमानता के प्रतीक आचार्यश्री ने वर्धमान महोत्सव के दूसरे दिन शनिवार को कूचबिहार इंडोर स्टेडियम में उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि संघ में सम्मानवर्धन स्थितियां भी मिलती हैं तो कई बार अपमानजनक स्थितियां भी प्राप्त हो सकती हैं। कभी किसी को अग्रणी का, कोई दायित्व प्रदान कर दिया जाता है तो कभी किसी को अग्रणी से हटा दिया जाता है या दायित्व वापस ले लिया जाता है। ऐसी स्थितियां संघीय जीवन में आ सकती हैं। इससे कई बार विचलन की भावना भी आ सकती है। ऐसी स्थितियां गौण और संघ सर्वोपरि होता है। इसलिए ऐसी छोटी-मोटी बातों पर आदमी को संघ को छोड़ने का विचार भी न आए ऐसा प्रयास होना चाहिए। जो आदमी या साधु छोटी-मोटी बातों को लेकर संघ को छोड़ देता है वह अभागा आदमी होता है। आचार्यश्री ने मुनि कनक का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने संघ के लिए अपने संसारपक्षीय पिता का परित्याग कर संघ की शरण स्वीकार की। संघ से एक व्यवस्थित आलंबन प्राप्त हो सकता है। आदमी को संघ और शासन के प्रति अटूट निष्ठा रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को निष्ठा की भावना को पुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।
          आचार्यश्री के मंगल प्रवचन से पूर्व मुख्यनियोजिकाजी ने भी श्रद्धालुओं को समर्पण और आज्ञा निष्ठा जैसे मंत्र बताते हुए जो गुरु आज्ञा को स्वीकार नहीं करता वह सफल नहीं हो सकता। गुरु की आज्ञा में रहने वाला सफलता के शिखर पर चढ़ता है। गुरु की आज्ञा अविचारणीय होती है। मर्यादा और के सभी जागरूक रहें और संघ के प्रति निष्ठावान होकर संघ के साथ स्वयं को भी प्रवर्धमान कर श्रावक अपने जीवन को सफल बनाएं।
          साध्वीवृन्द ने वर्धमान महोत्सव के उपलक्ष्य में गीत का संगान किया। दिगम्बर समाज की महिलाओं ने गीत द्वारा आचार्यश्री का अभिनन्दन किया। कूचबिहार ज्ञानाशाला के ज्ञानार्थियों ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनात्मक प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने साध्वीवृन्द से लेखपत्र और गुरु वन्दना का उच्चारण करवाया तो वहीं समणी सन्मतिप्रज्ञा, समणी मल्लीप्रज्ञा और समणी विकासप्रज्ञा से साध्वीवर्याजी के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। सभी समणियों ने साध्वीवर्याजी के विषय में अपने भाव अभिव्यक्त किए। गुरु की इस कृपा से समणीवृन्द भी अभिभूत नजर आ रही थी।



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