संयम और तपस्या के द्वारा आत्मशोधन की दिशा में आगे बढ़े : आचार्यश्री महाश्रमणजी

- बही पंचमुखी ज्ञानगंगा: माथाभांगावासी हुए अभिस्नात - 
- बरसाई विशेष कृपा, अपने श्रीमुख से माथाभांगावासियों को प्रदान की सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) -


          19 जनवरी 2017 माथाभांगा, कूचबिहार (पश्चिम बंगाल) (JTN) : माथाभांगा में प्रवास के दूसरे दिन गुरुवार को पंचमुखी ज्ञानगंगा में माथाभांगावासी अभिस्नात हुए। ज्ञानगंगा की पांच धाराओं का प्रवास ऐसे महसूस हो रहा था मानों माथाभांगा में ज्ञान का महाकुंभ लगा हो और हर समाज, जाति, वर्ग, धर्म और उम्र के बन्धनों का परित्याग कर सभी ज्ञानगंगा में गोते लगाने को आतुर थे। समान रूप और निष्पक्ष रूप से निर्झर बहते ज्ञान को सभी ने अपने-अपने क्षमता के अनुसार समेटा और अपनी आत्मा का उत्थान करने का प्रयास किया। इसके उपरान्त आचार्यश्री ने विशिष्ट अमृतवर्षा करते हुए अपने श्रीमुख से माथाभांगावासियों को सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) प्रदान की। भक्तवत्सल की कृपा से आह्लादित श्रद्धालुओं ने भी अपनी भावनाओं की पुष्पांजलि अर्पित की। 
गुरुवार को आचार्यश्री के मंचस्थ होने से पूर्व मुख्यनियोजिकाजी और असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया। श्री रूपचंद दूगड़ के आवास से आचार्यश्री लगभग तीन सौ मीटर का विहार कर प्रवचन स्थल पधारे। 
आचार्यश्री की उपस्थिति में साध्वीवर्याजी ने श्रद्धालुओं को दुनिया में सबसे आवश्यक गुरु को बताते हुए कहा कि कुछ लोग अन्न को आवश्यक बताते हैं, कोई जल को, कोई हवा को, किन्तु गुरु के बिना जीवन अधूरा होता है। गुरु के ज्ञान के बिना जीवन में अंधेरा छा जाता है। गुरु मार्ग को प्रशस्त करने वाले होते हैं। बच्चों की पहली गुरु माता और पिता होते हैं। साध्वीवर्याजी ने लौकिक गुरु और लोकोत्तर गुरु की व्याख्या की और कहा कि आचार्यश्री जैसे लोकोत्तर गुरु से प्रेरणा प्राप्त कर अपने जीवन को सन्मार्ग पर ले जाने का प्रयास करें। साध्वीवर्याजी ने ‘भवसागर पार उतारो जी’ गीत का संगान भी किया। 
मुख्यमुनिश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन में संगति का महत्त्व बताते हुए कहा कि आदमी को गुणवान व्यक्ति की संगत आदमी को अच्छा बनाती है। जिसमें अच्छा गुण होता है उसका प्रभुत्व होता है। बड़प्पन जन्म से नहीं, गुणो से प्राप्त होता है। गुणवान व्यक्ति की संगत कल्याणकारी होती है। हमारा सौभाग्य है कि हम सबको ऐसे महान गुरु का सान्निध्य प्राप्त है। आप सभी गुरु सन्निधि का लाभ उठा अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करें। 
ज्ञानगंगा की चार धाराओं के प्रवाह के बाद पांचवी व मुख्यधारा के रूप में भक्त वत्सल आचार्यश्री ने अपने श्रीमुख से ज्ञानगंगा का प्रवाह करते हुए श्रद्धालुओं को अभिस्नात किया। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को तपस्या के माध्यम से आत्मशोधन का महामंत्र प्रदान करते हुए कहा कि तपस्या करने वाला का जीवन अच्छा हो सकता है। तपस्या शरीर से और वाणी से भी होती है। अनाहार की तपस्या, उनोदरी, और किसी मनोज्ञ खाद्य पदार्थ का त्याग करना शारीरिक तपस्या है। मौन रहना, झूठ न बोलना, किसी की बुराई नहीं करना और किसी को अपशब्द न बोलने का प्रयास करना वाणी की तपस्या है। मानसिक तप द्वारा मन को एकाग्र बनाया जा सकता है। मन को एक बिन्दु पर केन्द्रित करना मानस तप है। साधु-साध्वियों के पास तपस्या रूपी ही धन होता है। गृहस्थों के पास तो भले धन मिल जाए, लेकिन उनके धन कभी कोई चुरा सकता है या हड़प सकता है, किन्तु साधु-साध्वियों के पास जो तपस्या रूपी धन का खजाना है तो न तो उसे कोई चोर चुरा सकता है और न ही कोई हड़प सकता है। इस तपस्या का अपना महत्त्व है। इसलिए आदमी को संयम और तपस्या के द्वारा आत्मशोधन की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। 
ज्ञान रूपी पंचगंगा में तन-मन को निर्मल बनाने के उपरान्त आचार्यश्री ने माथाभांगावासियों पर अमृत की वृष्टि करते हुए उन्हें अपने श्रीमुख से सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) प्रदान की। आचार्यश्री ने उन्हें गुरुधारणा के संकल्पों को स्वीकार कराया। साथ ही देव, गुरु और धर्म के प्रति संपूर्ण जीवन के लिए श्रद्धा का समर्पण करने की भी प्रेरणा प्रदान की। अंत में आचार्यश्री माथाभांगावासियों को अपने शुभाशीष से आच्छादित करते हुए कहा कि माथाभांगा में खूब धर्म की प्रभावना रहे, साधना का, धर्माराधना का खूब अच्छा क्रम चले, खूब अच्छा रहे। 
गुरुकृपा की बरसात से सराबोर श्रद्धालु भावविभोर नजर आ रहे थे। अपने आराध्य देव के समक्ष दूसरे दिन भी भावनाओं को पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। श्रीमती मीनू धाड़ेवा, श्री बाबूलाल, तेरापंथ युवक परिषद माथाभांगा अध्यक्ष श्री रितेश धाड़ेवा सुश्री आशा बोथरा ने अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से बयां किया तो श्रीमती सीमा जैन ने कविता पाठ कर आचार्यश्री के समक्ष अपने भावसुमन अर्पित किए। श्री डालचंदजी के परिवार के सदस्यों ने भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। वहीं श्री सोहनलाल भदाणी परिवार के सदस्यों ने व कन्या मंडल ने गीत के माध्यम गुरु चरणों की अभ्यर्थना की। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने लघु नाट्य की प्रस्तुति दे आचार्यश्री से शुभाशीष प्राप्त किया।


 



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