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मनुष्य में मनुष्यता रहें - आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          21 जनवरी 2017, जमालदा (पश्चिम बंगाल) (JTN) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ जमालदा के लिए विहार किया। आठ किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री जमालदा पहुंचे। 
आचार्यश्री ने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि जिस आदमी का मन सदैव धर्म में रमा रहता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। धर्म के तीन प्रकार बताए गए हैं-अहिंसा, संयम और तप। ये तीनों जिस आदमी के जीवन में आ जाएं तो उसका जीवन धर्ममय बन सकता है। जिसके जीवन में र्धम होता है उसका जीवन मंगल हो सकता है। आदमी को सबके प्रति दया और अनुकंपा का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी स्वयं को निडर और दूसरों को अभयता प्रदान कर अहिंसा की साधना कर सकता है। संयम से जीवन जीना से भी आदमी धर्मयुक्त जीवन जी सकता है। तपस्या भी धर्म का एक माध्यम है। आदमी इन सूत्रों को अपने जीवन में उतार ले तो जीवन में मंगल हो सकता है। आदमी को धर्मयुक्त आचरण करने का प्रयास करना चाहिए। धर्म में रमे रहने वाले आदमी को देवता भी नमस्कार करते हैं। 
आचार्यश्री ने उपस्थित लोगों को अहिंसा यात्रा के तीनों संकल्पों की अवगति प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को सद्भावपूर्ण व्यवहार करने का प्रयास करना चाहिए। सबके प्रति मैत्री और सौहार्द भाव रखे तो जीवन में सद्भावना का प्रभाव हो सकता है। आदमी कोई भी काम करने में उसमें ईमानदारी बरतने का प्रयास करना चाहिए। आदमी के काम में प्रमाणिकता रहे तो जीवन में शांति आ सकती है। आदमी नशामुक्त जीवन जीने का प्रयास करे। इन तीनों संकल्प को स्वीकार कर आदमी अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है। आचार्यश्री ने ‘यह है जगने की बेला’ गीत का आंशिक संगान भी किया। 
आचार्यश्री ने जमालदावासियों से इन तीनों संकल्पों को स्वीकार करने का आह्वान किया। आचार्यश्री के आह्वान पर उपस्थित लोगों सद्भावपूर्ण व्यवहार करने, यथासंभव ईमानदारी का पालन करने और नशामुक्त जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री के स्वागत में जमालदा तेरापंथी सभा अध्यक्ष प्रकाश भदानी, श्रीमती सारिका जैन ने भावनाओं की अभिव्यक्ति दी तो महिला मंडल और कन्या मंडल ने स्वागत गीत का संगान कर आचार्यश्री के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित किया। इसके उपरान्त आचार्यश्री वहां से पुनः छह किलोमीटर का विहार कर बड़ोकामत प्राइमरी स्कूल पहुंचे। 







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