संयमी और सहनशील बने : आचार्यश्री महाश्रमण

इस तरह व्याप्त हो शांति कि बेकार हो जाएं गोलियां : पुज्यप्रवर
- भारत-बंगालादेश के चंगड़ाबंधा अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर दोनों देश के जवानों को दिया शांति और सद्भावना का संदेश -
- आचार्यश्री के आह्वान पर जवानों ने स्वीकार किए अहिंसा यात्रा के संकल्प -
- चंगड़ाबंधावासियों ने गुरुमुख से स्वीकार की सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) -
आचार्यश्री महाश्रमणजी

          23 जनवरी 2017, चांगड़ाबंधा, कूचबिहार (पश्चिम बंगाल) (JTN) : सोमवार को चंगड़ाबंधा स्थित भारत-बंगलादेश अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर शांति, अमन, चैन और भाईचारे का गुल खिलाने जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी श्वेत सेना के साथ पहुंचे। जहां 61वीं वाहिनी बीएसएफ के कंपनी कमाण्डर श्री राजेश कुमार ने आचार्यश्री का स्वागत किया और जवानों को पावन पाथेय प्रदान करने का आग्रह किया। आचार्यश्री ने उपस्थित जवानों और नागरिकों को अहिंसा यात्रा के तीन महान उद्देश्यों की अवगति प्रदान की और उन्हें उत्प्रेरित कर अहिंसा यात्रा का संकल्प भी स्वीकार करवाया। 
कहते हैं जब बात हो शांति की, सौहार्द की, नैतिकता और मानवता के उत्थान की तो उसके लिए न तो कोई सीमा बाधक बनती है और न तो कोई भाषा, धर्म या कोई देश। इसी प्रकार मानवता का शंखनाद करते हुए जब कोई महामानव मानवता की अलख जगाता है तो वह केवल एक गांव, एक राज्य, एक देश के लिए नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के जनमानस का शुभचिन्तक होता है, जो लोगों के भीतर व्याप्त बुराइयों के तिमिर को मिटा मानवता का आलोक फैलाता है। सोमवार को कुछ ऐसे ही वाक्यों को चरितार्थ कर रहे थे मानवता के मसीहा, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी। अपनी श्वेत सेना के साथ प्रातः नौ बजे भारत-बंगलादेश की अंतराष्ट्रीय सीमा चंगड़ाबंधा पर अपनी श्वेत सेना के साथ उपस्थित हुए। यह सेना किसी पर अधिकार करने नहीं, किसी का नुकसान करने नहीं, कोई जमीन पर अधिकार करने नहीं, बल्कि मानवता का संदेश देने के लिए बंगलादेश की सीमा तक पहुंची थी। जीतने तो पहुंची थी लेकिन जमीन नहीं, लोगों के दिल को। कब्जा करना था, किन्तु देश पर नहीं, लोगों के दिलों पर। शासन करना था, किसी देश पर नहीं, बल्कि लोगों के भीतर व्याप्त बुराइयों पर, विषय में डूबने वाली इन्द्रियों पर। 
आचार्यश्री का स्वागत करते हुए भारतीय सेना बीएसएफ के कंपनी कमाण्डर श्री राजेशकुमार ने कहा कि आज हमें बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। यहां हम दोनों देशों के जवान अपनी-अपनी ड्यूटी निभाते हैं। आज हमारे बीच शांति के संवाहक आचार्यश्री महाश्रमणजी पहुंचे हैं। मैं आपका हार्दिक स्वागत-अभिनन्दन करता हूं। मैं आचार्यश्री से आग्रह करता हूं कि वे अपनी मंगलवाणी से जवानों को उपदेश दें। 
परम दयालु आचार्यश्री ने उपस्थित लोगों को मंगल संबोध प्रदान करते हुए कहा कि आज हम भारत सीमा में और बंगलादेश की सीमा के परिपाश्र्व में पहुंचे हैं। इस अहिंसा यात्रा के माध्यम से हम लोगों को तीन बातें बता रहे हैं-सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति। सद्भावना-अर्थात् जाति, धर्म, संप्रदाय और देश के नाम पर हिंसा, मारकाट न हो बल्कि एक-दूसरे के प्रति सौहार्द और मैत्री की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। नैतिकता-आदमी अपने जीवन में कोई भी कार्य करे, भले सुरक्षा की ही बात हो, अपने कार्य में प्रमाणिकता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। नशामुक्ति-आदमी नशामुक्त जीवन का रास्ता अपनाए तो उसके जीवन से कितनी बुराइयां स्वतः समाप्त हो सकती हैं। आचार्यश्री के आह्वान पर कंपनी कमाण्डर श्री कुमार सहित उपस्थित भारतीय सेना के जवान और बंगलादेश के जवानों ने भी सद्भावपूर्ण व्यवहार करने, यथासंभव ईमानदारी का पालन करने व पूर्णतया नशामुतक्ति जीवन जीने के संकल्पों का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने दोनों देशों के लिए आध्यात्मिक मंगलकामना करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच इतनी शांति रहे कि गोलियां बेकार हो जाएं। खूब शांति की रहे। 
          प्रवास के अंतिम दिन चंगड़ाबंधावासियों पर गुरु की विशेष कृपा बरसी। एक ओर उनके आराध्यदेव स्वयं उनके घर पधारकर दर्शन दिए। तो वहीं अंतर्राष्ट्रीय सीमा को भी अपने चरणरज से पावन किया। उसके उपरान्त जब प्रवचन स्थल पहुंचे तो अमृतवाणी के साथ संसार रूपी भवसागर को तरने के लिए सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) रूपी ऐसी पतवार भी थमा दी जिसके माध्यम से आदमी अपने जीवन की नौका को भवसागर से पार ले जा सके। गुरु की बरसती कृपा से अभिस्नात चांगड़ाबंधावासियों ने भी अपनी भावनाओं की पुष्पांजलि श्रीचरणों में अर्पित कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 
आचार्यश्री के मंचस्थ होने से पूर्व मुख्यनियोजिकाजी और महाश्रमणजी साध्वीप्रमुखाजी ने चंगड़ाबंधावासियों को आध्यात्मिक ज्ञान का अभिसिंचन प्रदान किया। उसके उपरान्त आचार्यश्री की छत्रछाया में पलते तेरापंथ धर्मसंघ के दो नए वट वृक्ष क्रमशः साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनिश्री ने भी श्रद्धालुओं को जीवन को अच्छा बनाने की अभिप्रेरणा प्रदान की। 
इसके उपरान्त कीर्तिधरपुरुष, प्रभावी प्रवचनकार आचार्यश्री ने अपने श्रीमुख से ज्ञानगंगा प्रवाहित की और लोगों को अच्छा जीवन जीने की अभिप्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को अपनी वाणी का संयम करने का प्रयास करना चाहिए। बिना पूछे कुछ बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को मौके पर ही बोलने और पूछने पर ही संयमपूर्ण और सारपूर्ण बोलने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को झूठ बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को झूठ छोड़ना मुश्किल लगे, तो उसे कम करने का प्रयास करना चाहिए। गुस्से को शांत या निष्फल करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को प्रिय-अप्रिय, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों को धारण करने का प्रयास करना चाहिए। सहनशीलता पूर्वक जितना हो सके सहन करने का प्रयास करना चाहिए। सहन नहीं करने से अशांति का माहौल कायम हो सकता है। 
आचार्यश्री ने अभिप्रेरित करते हुए परिवार संस्कारमय हो, सभी सदस्यों में सहनशीलता की भावना ओं तो धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूति की जा सकती है और अशांत और असहनशील परिवार की स्थिति नरक के समान हो सकती है। इसलिए आदमी को अच्छा जीवन जीने के लिए वाणी का संयम और सहनशील बनने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री ने चांगड़ाबंधावासियों पर विशेष कृपा बरसाते हुए अपने श्रीमुख से सम्यक्त्व दीक्षा (गुरुधारणा) प्रदान की और उन्हें यावज्जीवन के लिए देव, गुरु और धर्म के प्रति श्रद्धा का समर्पण करने का संकल्प करवाया। आचार्यश्री ने सभी नियमों का पालन करने के साथ ही संवत्सरी का उपवास और शनिवार की सामायिक को भी करने की विशेष प्रेरणा भी प्रदान की। चांगड़ाबंधावासियों के प्रति मंगलकामना करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि चांगड़ाबंधा ने खूब धर्म-ध्यान की भावना रहे, खूब अच्छा रहे, खूब शांति रहे। 
आचार्यश्री की इस कृपा और आशीषवृष्टि में अभिस्नात श्रद्धालुओं ने भी अपनी भावनाओं की पुष्पांजलि श्रीचरणों में अर्पित की। सुश्री मानवी आंचलिया, चांगड़ाबंधा महिला मंडल अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा कोठारी, मंत्री श्रीमती वीणा सुराणा ने अपनी भावनाओं के सुमन अर्पित कर आचार्यश्री से शुभ आशीर्वाद प्राप्त किया। अग्रवाल समाज की महिलाएं, आंचलिया परिवार, पारख परिवार और कोठारी परिवार के सदस्यों ने भी गीत के माध्यम से आचार्यश्री की अभ्यर्थना की। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने भी अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से अपने आराध्यदेव की अभ्यर्थना की। 
इसी बीच महातपस्वी संत आचार्यश्री महाश्रमणजी के दर्शन को पश्चिम बंगाल सरकार के पूर्व खाद्यमंत्री श्री परेश अधिकारी भी पहुंचे। आचार्यश्री के दर्शन कर पावन पाथेय प्राप्त किया। उसके उपरान्त उन्होंने बंगाली भाषा में अपने भावनाओं को अभिव्यक्त कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। 






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