मत भेद भले हो लेकिन मन भेद नहीं होना चाहिए : आचार्यश्री महाश्रमण

- सर्वधर्म सौहार्द सम्मेलन: सभी धर्मों का सार सत्य और अहिंसा -
-अणुव्रत महासमिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जुटे सभी धर्मों के प्रतिनिधि -

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          30 जनवरी 2017 राधाबाड़ी, जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) (JTN) : पश्चिम बंगाल की धरा पर पहली बार सिलीगुड़ी के राधाबाड़ी में आयोजित 153वें मर्यादा महोत्सव के लिए आठ दिवसीय प्रवास के दूसरे दिन सोमवार को सर्वधर्म सौहार्द सम्मेलन का आयोजन हुआ। आयोजन में जुटे विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने सत्य, अहिंसा को सभी धर्मों का सार बताया और इंसानियत को सर्वोच्च धर्म बताते हुए लोगों को आपस में प्रेम और सौहार्द से रहने की प्रेरणा दी। इस सौहार्द सम्मेलन में साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनिश्री ने भी लोगों को उत्प्रेरित किया। वही बौद्धधर्म लामाओं ने मंत्रोच्चार किया तो ब्रह्मकुमारी रंगीताजी ने लोगों को दो मिनट का ध्यान कराया। 
  सोमवार को मर्यादा समवसरण के विशाल पंडाल में सनातन धर्म की ओर से शास्त्री श्री युगलकिशोर उपाध्याय, सिक्ख धर्म से सिलीगुड़ी गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्री गुरुशरण होड़ा, इस्लाम से मौलाना काजी खलीलुर्रहमान, बौद्ध धर्म की ओर से जम्मूलामा, ब्रह्मकुमारीजी रंगीताजी उपस्थित थे। मंचासीन आचार्यश्री के साथ विराजमान इन विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को देख यहां का पूरा वातावरण आपसी सौहर्दता का परिचायक बना हुआ था। 
  इस सम्मेलन का शुभारम्भ आचार्यश्री के नमस्कार महामंत्र के उच्चारण के पश्चात सिलीगुड़ी अणुव्रत समिति के सदस्यों ने अणुव्रत गीत का संगान कर किया। इसके उपरान्त साध्वीवर्याजी ने लोगों को उद्बोध प्रदान करते हुए कहा कि जो आदमी अकिंचन होता है, वह त्रिलोकस्वामी होता है। जिसका दुनिया में अपना कुछ भी नहीं उसी का सबकुछ है और एक अकिंचन ही साधु बनने के लायक होता है। इसलिए आदमी को संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने आचार्यश्री से इसकी प्रेरणा प्राप्त कर अपने जीवन को अच्छा बनाने की प्रेरणा प्रदान की। 
  मुख्यमुनिश्री ने आदमी के जीवन में श्रद्धा का महत्त्व बताते हुए कहा कि जिसके जीवन में श्रद्धा के भाव हों, वह अपने जीवन को प्रसन्न बना सकता है। श्रद्धा से उल्लास पैदा करती है। श्रद्धाशील व्यक्ति इतना सरल बन जाता है कि उसके सामने कितनी भी कठिनाई आए वह सहजता से पार कर लेता है। वह किसी भी समस्या से पार पा लेता है। श्रद्धाशील व्यक्ति धैर्यवान होता है। वह कभी तनाव में नहीं जाता। श्रद्धा को परम दुर्लभ बताते हुए कहा कि देव, गुरु और धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा हो तो वह पाप को छोड़ सन्मार्ग पर बढ़ता है। हमारी श्रद्धा दिन-प्रतिदिन बढ़े, ऐसा प्रयास करना चाहिए। 
  आचार्यश्री ने उपस्थित लोगों को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि स्वयं सत्य को खोजें और प्राणियों को साथ मैत्री का संबंध रखने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य के श्रद्धा का धाम सच्चाई हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने अहिंसा यात्रा के शुभारम्भ और इसके तीन मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करते हुए कहा कि नौ नवम्बर 2014 को दिल्ली से निकली इस यात्रा में हम लोगों को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की बात बता रहे हैं। भारत में विभिन्न जाति, धर्म, भाषा के लोग, उनके धर्मगुरु और नेता है। यह भारती भिन्नता है। इसके बावजूद भी मैत्री और सौहार्द का भाव तो है उसे और अधिक बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। मतभेद हो लेकिन मन भेद नहीं रखना चाहिए। विभिन्न धर्मगुरुओं और उनके नेताओं द्वारा अपने अनुयायियों को आत्मा की निर्मलता का मार्गदर्शन मिलता रहे तो, भारत देश और अच्छा बन सकता है। भारत में भौतिक विकास, आर्थिक विकास के साथ नैतिक, आध्यात्मिकता का भी विकास हो तो और यह देश और अधिका विकास को प्राप्त कर सकता है। भारत के पास ग्रंथों और संतों की संपदा है, जो भारत के लिए अच्छी बात है। अलग-अलग धर्मों की अपनी पूजा पद्धतियां भले अलग हों किन्तु अहिंसा और सच्चाई रूपी धर्म को तो सभी स्वीकार करते हैं। दुनिया में कोई ऐसा धर्म या संप्रदाय संभवतया नहीं होगा जो अहिंसा और सत्य की बात को न माने। आचार्यश्री के आह्वान पर उपस्थित लोगों ने अहिंसा यात्रा के संकल्प यथा सद्भावूपर्ण व्यवहार करने, यथासंभव ईमानदारी का पालन करने और पूर्णतया नशामुक्त जीवन जीने का संकल्प स्वीकार किया। आचार्यश्री ने प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि यदि भारतीय नागरिक नैतिक मूल्यों को बनाए रखें तो भारत की नैतिकता पूरे विश्वपटल पर स्थापित हो सकती है। 
  सिक्ख समुदाय के प्रतिनिधि श्री गुरुशरण होड़ा ने लोगों ने जैन धर्म और सिक्ख धर्म के बीच ऐतिहासिक संबंधों का वर्णन किया और कहा कि जब सभी एक ईश्वर के बंदे हैं तो हम किसी क्यों भला या बुरा कहें। आज मिलजुलकर एक साथ रहने का प्रयास करना चाहिए। धर्म को कार्पोरेट की तरह चलाने से समस्या बनी हुई है। इसलिए यदि सभी धर्म के लोग अपनी बात करें लेकिन दूसरे धर्मों की बुराई करने से बचें तो देश में सौहार्द का और अच्छा माहौल बन जाएगा। सनातन धर्म की ओर इस सम्मेलन में उपस्थित हुए शास्त्री श्री युगलकिशोर उपाध्याय ने कहा कि सिलीगुड़ी की धरा का सौभाग्य है जो यहां समय-समय पर संतों का आगमन होता रहता है और अपने उपदेशों लोगों को लाभान्वित करते रहते हैं। उन्होंने भगवान ऋषभ को विष्णु का अवतार बताते हुए कहा कि उन्होंने लोगों को निर्लोपता की बात बताई। ‘सत्यं परम धिमही’ के सूत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य ही ईश्वर है। मनसा, वाचा कर्मणा से किसी की हिंसा न हो। उन्होंने आचार्यश्री अहिंसा यात्रा के लिए शुभकामना देते हुए कहा कि यह मेरा सौभाग्य है मुझे परमपूज्य आचार्यश्री तुलसी, आचार्यश्री महाप्रज्ञ और आचार्यश्री महाश्रमणजी का सान्निध्य प्राप्त कर चुका हूं। 
  बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए जम्मूलामा ने कहा कि इस पवित्र सभा का आयोजन अति उत्तम है। उन्होंने उपस्थित लोगों को अपने चित्त के शुद्धिकरण कर अच्छे कर्म करने की प्रेरणा दी। 
इस्लाम धर्म की ओर से मौलाना काजी खलीलुर्रहमान ने पानी का धर्म प्यास बुझाना, हवा का धर्म लोगों को श्वास प्रदान करना, सूर्य का धर्म लोगों को रोशनी देना। यह सभी तो अपने-अपने धर्म पर कायम हैं, किन्तु यदि कोई अपने धर्म पर कायम नहीं है तो वह है इंसान। जो इंसान के लिए कल्याणकारी वहीं धर्म है। इसलिए अपने आपको पहचानिए और सुधार करिए तो पूरी दुनिया सुधर जाएगी। 
  ब्रह्मकुमारी रंगीताजी ने इस धर्म सम्मेलन में उपस्थित सभी धर्म के लोगों को देख अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि पूरा विश्व एक परिवार है क्योंकि सभी एक पिता की संतान हैं। वर्तमान समाज में पापाचार, भ्रष्टाचार और समस्याएं लोगों को जकड़े हुए है। मानव अपनी मानवता को भूल चुका है। इसलिए आदमी स्वयं जुड़े और आत्मानुभूति करे तो इन बुराइयों से बच जाएगा। अपनी आत्मा को जानकर सच्चे सुख को प्राप्त करें। अंत में उन्होंने दो मिनट का ध्यान भी कराया। वहीं उपस्थित प्रशिक्षु लामाओं ने मंत्रोच्चार किया। अंत में सभी प्रतिनिधियों को सिलीगुड़ी अणुव्रत समिति द्वारा साहित्य भेंट कर सम्मानित किया गया। 






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