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आदमी उपासना के माध्यम से अपनी आत्मा का कल्याण करें : आचार्यश्री महाश्रमण

- मर्यादा का महामहोत्सव, तेरापंथ के महासूर्य के प्रकाश हो उठा आलोकित -
- कमल रूपी पंडाल पर खिले तेरापंथ धर्मसंघ के कमलनयन -
- आचार्यश्री ने चतुर्विध धर्मसंघ को विभिन्न अलंकरणों से किया वर्धापित, विभिन्न घोषणा, नियम और साधु-साध्वियों को चतुर्मास-विहार का मार्ग भी किया प्रशस्त -

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          03 फरवरी 2017 राधाबाड़ी, जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) (JTN) : अविस्मरणीय, अद्भुत, ऐतिहासिक। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 153वें मर्यादा महामहोत्सव का भव्य समापन हुआ। हजारों श्रद्धालुओं का रेला, साधु-संतों के मुख से धर्मसंघ की प्रभावना, असाधारण साध्वीप्रमुखाजी का स्नेहवृष्टि और तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें महासूर्य के श्रीमुख से बहती अमृतरस ने चतुर्विध धर्मसंघ को एक नई ऊर्जा, नई प्रेरणा और निरन्तर प्रवर्धमानता अभिसिंचन प्रदान किया। गुरुमुख से अनेकों साधु-साध्वियों को विभिन्न अलंकरणों से अलंकृत किया तो वहीं श्रावक-श्राविकाओं को विभिन्न अलंकरण प्रदान किए। इसके अलावा साधु-साध्वियों, समण-समणियों के आगामी चतुर्मास-विहार के बारे में भी फरमाया। आचार्यश्री द्वारा अनेक घोषणाएं और अनेक प्रकार की प्रेरणाएं प्रदान की गईं, जो धर्मसंघ को विकासोन्नमुखी बनाने के लिए अभिप्रेरित करने वाली थी। 
          त्रिदिवसीय महामहोत्सव का अंतिम दिन अर्थात् माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव का महत्त्वपूर्ण दिन। कमलाकृति के रूप में बना भव्य मंच बंगाल की कलाविधा को प्रदर्शित कर रहा था। निर्धारित समयानुसार जब अपने साधु-साध्वी, समण-समणी रूपी समस्त श्वेतरश्मियों के साथ तेरापंथ के महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी जब मंचस्थ हुए तो कमलरूपी मंच इस महासूर्य का आलोक पाकर उसी प्रकार खिल उठा जैसे कमल पुष्प सूर्य की रोशनी में खिल उठता है। तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य के सान्निध्य में इस अवसर को मनाने के लिए पहुंची श्रद्धालुओं की अपार भीड़ ने विशाल प्रवचन पंडाल को बौना बना दिया था। फिर भी मर्यादा महोत्सव में पहुंचे श्रद्धालु अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखते हुए यथास्थान प्राप्त कर बैठे या खड़े थे। 
          महामहोत्सव के अंतिम दिन का शुभारम्भ भी आचार्यश्री के श्रीमुख से नमस्कार महामंत्र के प्रस्फुटन से हुआ जो श्रद्धालुओं को नई प्रेरणा प्रदान करने वाला था। इसके उपरान्त समणीवृन्द, साध्वीवृन्द और मुनिवृन्द ने अपने-अपने गीतों का संगान कर संघ की प्रवर्धमानता की मंगलकामना की और संघ और संघपति के प्रति श्रद्धा, निष्ठा को बनाए रखने का वरदान मांगा। 

संघ से विकास, त्राण, प्राण और सबकुछ हो सकता है प्राप्तः असाधारण साध्वीप्रमुखा 

          इस अवसर पर तेरापंथ धर्मसंघ की महाश्रमणी, संघ महानिदेशिका तथा असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने उपस्थित जनमेदिनी पर अपनी स्नेहवृष्टि करते हुए कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य आचार्य भिक्षु ने इस धर्मसंघ की स्थापना की और एक रूप प्रदान किया। यह धर्मसंघ महाप्रभावी है। यहां कदम-कदम पर प्रेरणा मिलती है। संघ से विकास, त्राण, प्राण और सबकुछ प्राप्त होता है। महाश्रमणीजी ने संघ हित में सबका हित बताया और कहा कि संघ के प्रति प्रत्येक व्यक्ति में समर्पण का भाव हो। संघ में संघ प्रमुख और व्यक्ति गौण हो जाता है। संघ के प्रति अंतिम सांस तक समर्पण का भाव का भाव हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री को एक माली की उपमा देते हुए महाश्रमणी जी ने कहा कि इस तेरापंथ बगिया के आचार्यश्री माली के समान हैं जो धर्मसंघ के शिष्य रूपी फूलों को चुनकर उनका सही जगह उपयोग करते हैं, अभिसिंचित करते हैं और देखभाल भी करते हैं। जो साधु-साध्वी अहंकारी उन्हें आचार्यश्री झुकाते हैं और विनयानवत को ऊंचा उठाते हैं। आचार्यप्रवरों द्वारा इस बगिया का सार-संभाल होता है। साधु-साध्वियों और श्रावक-श्राविकाओं को गुरु के एक इंगित पर अपना सर्वस्व समर्पण का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। 
महामहोत्सव पर महाश्रमण का महाउद्बोधन 
          तेरापंथ धर्मसंघ के मर्यादापुरुष आचार्यश्री महाश्रमणजी ने महामहोत्सव के अंतिम दिन उपस्थित श्रद्धालुओं और दूसर संचार माध्यमों के द्वारा कार्यक्रम के सीधे प्रसारण से जुड़े हुए श्रद्धालुओं को अपने श्रीमुख से अभिसिंचन प्रदान करते हुए कहा कि हे प्रभो! यह तेरापंथ है और हम उसके पथिक हैं। हमें जो तेरापंथ धर्मसंघ प्राप्त हुआ है उसके प्रणेता आचार्य भिक्षु हैं। जैसे किसी राष्ट्र, समाज या संगठन को चलाने के लिए एक विधान की आवश्यकता या संविधान की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक आचार्यश्री भिक्षु ने विक्रम संवत 1859 को मर्यादा पत्र के रूप में एक संविधान लिखा, जो आज तक सुरक्षित है। इस संविधान का बहुत बड़ा सम्मान है। यह पत्र आज के इस उत्सव का सक्षम आधार है। इस संविधान या पत्र के माध्यम से जो आदेश, निर्देश, संदेश, उपदेश मिले हैं, उनका बहुत महत्त्व है। किसी भी समाज, संगठन या राष्ट्र को चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है जो जिसका संविधान स्पष्ट नहीं होता, उसके सम्यक् संचालन में बाधा आ सकती है। आज का दिन उत्सव का दिन है। आचार्यश्री ने राजस्थानी भाषा में लिखे मर्यादा पत्र का वाचन किया और आवश्यक नियमों से लोगों को अवगत कराया। आचार्यश्री ने मर्यादा पत्र को आज का कार्यक्रम का आधारभूत बताते हुए कहा कि पूर्व में धर्मसंघ के दस आचार्यों को श्रद्धा के साथ नमन किया। 
          आचार्यश्री ने साधना, शासना, सुवासना और उपासना के विषय में अवगति प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को साधना के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। राग-द्वेष के भाव कमजोर रहें, साधना के प्रति जागरूकता हो और आदमी अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करे तो वह अच्छा साधक बन सकता है। आचार्यश्री ने दूसरी बात शासना के बारे में बताते हुए कहा कि हम सभी संघबद्ध साधना करते हैं। संघ में साधना करने की सुविधा हो सकती है। संघ है तो शासना की बात ही आती है, मर्यादा की बात होती है। सभी साधु-साध्वियों को एक आचार्य की छत्रछाया में रहने का विधान है। एक आचार्य पर संघ के सर्वोच्च नेतृत्व का दायित्व होता है। इस धर्मसंघ में एक आचार्यतंत्र की प्रणाली है। संघ में शासना है तो अनुशासन की बात भी होती है। गुरु की कड़ाई को भी शिरोधार्य करने का प्रयास करना चाहिए। संघ-संघपति से अटूट नाता होता है। गुरु की कठोरता का भी सम्मान करने का प्रयास करना चाहिए और उसे विनय के साथ स्वीकार करने का प्रयास करना चाहिए। सभी को अपने भीतर विनय के भाव को पुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। तीसरी बात सुवासना के बारे में आचार्यश्री ने बताते हुए कहा कि धर्मसंघ के साधु-साध्वियों और श्रावक-श्राविकाओं में अच्छे संस्कार का निर्माण को इसका प्रयास करना चाहिए। बालमुनियों और बालसाध्वियों को वर्धापित करते हुए आचार्यश्री उन्हें खूब अच्छा विकास करने और संस्कारों की सुवासना लाने की प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने सभी को अच्छे संस्कारों की सुवासना से सुवासित होने और मर्यादित रहने के लिए अभिप्रेरित किया। अंत में आचार्यश्री ने उपासना करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि आदमी को उपासना के माध्यम से अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। 
          आचार्यश्री ने 153वें मर्यादा महोत्सव पर स्वरचित गीत का संगान किया और पिछली बार मर्यादा महोत्सव के समय दी गई सामायिक की प्रेरणा के क्रम को आगे बढ़ाने और साथ शनिवार की सामायिक के दौरान ‘तेरापंथ प्रबोध’ का प्राधान्य रखने की बात बताई। आचार्यश्री ने ‘श्रावक-संदेशिका’ पुस्तिका के विषय में अवगति प्रदान की। अंत में सभी सभाओं, संस्थाओं और संगठनों सहित ज्ञानशाला के क्रम को आगे बढ़ाने और सबके विकास की मंगलकामना की। 

आचार्यश्री ने की विभिन्न घोषणाएं 

          आचार्यश्री ने एक विशेष घोषणा करते हुए कहा कि मुमुक्षु बाइयों को अब पहले समणी दीक्षा प्रदान की जा सकेगी और यथानुकूलता उन्हें बाद में साध्वी दीक्षा दी जा सकती है। वर्ष 2017 में कोलकाता में होने वाले चतुर्मास से पूर्व 30 जून को आचार्यश्री ने मुमुक्षु शालिनी, ममता व अनमोल को समणी दीक्षा तथा वैरागी जयंत बुच्चा को मुनि दीक्षा देने के भाव प्रकट किए। वहीं वर्ष 2018 में कटक में आयोजित होने वाले मर्यादा महोत्सव में पहुंचने के लिए कुछ लंबा रास्ता लेकर पारसनाथ, बोकारो को पावन करने, भुवनेश्वर में वर्धमान महोत्सव समपन्न कर 20 जनवरी 2018 को मर्यादा महोत्सव के लिए कटक में प्रवेश करने की घोषणा की। वर्ष 2018 की अक्षय तृतीया विशाखापत्तनम और वर्ष 2019 का मर्यादा महोत्सव में कोयम्बतूर में करने की भावना भी प्रकट की। इस दौरान आचार्यश्री ने कुल कई साधु-साध्वियों को शासन श्री का अलंकरण प्रदान किया तो धर्मसंघ के मंत्री मुनिश्री 75 वर्ष के दीक्षा पर्याय के प्रति खड़े होकर मंगलकामना की और उन्हें 100 वर्षों का दीक्षा पर्याय पूर्ण करने की कामना की। आचार्यश्री ने उन्हें शासन स्तम्भ अलंकरण से भी अलंकृत किया। वहीं कुल 64 श्रावक-श्राविकाओं को भी विभिन्न अलंकरणों से विभूषित किया। लगभग 77 साधु-साध्वियों और समण-समणियों के चतुर्मास व विहार के स्थान भी आचार्यश्री ने उद्घोषित किए। 
          इस कार्यक्रम में 44 साधु, 58 साध्वियां, एक समण और 68 समणियों सहित कुल 171 चारित्रात्माओं की उपस्थिति रही। अंत में आचार्यश्री के निर्देशानुसार साधु-साध्वियों ने पंडाल के मध्य पंक्तिबद्ध होकर लेखपत्र का उच्चारण किया और संघ-संघपति के प्रति अपनी निष्ठा के संकल्पों को दोहराया। आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों के पंक्तिबद्ध होने से बने प्राकार को मर्यादा का प्राकार बताते हुए कहा कि यह हम सभी के आत्मा के आसपास बना रहे और सभी आत्म कल्याण का प्रयास करते रहें। श्रावक-श्राविकाओं ने भी आचार्यश्री के आह्वान पर श्रावक निष्ठा पत्र का उच्चारण कर अपनी निष्ठा और श्रद्धा के भावों को अभिव्यक्त किया। संपूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ ने आचार्यश्री की अगुवाई में संघगान किया, मंगलपाठ का श्रवण किया और अंत में आचार्यश्री ने मर्यादा महोत्सव के इस त्रिदिवसीय आयोजन के समापन की घोषणा की। 























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