मितभाषी दोष रहित और जागरूकता पूर्वक बोलने वाला साधु : आचार्यश्री महाश्रमण

- साधु-साध्वियों के लिए है विशेष महत्त्वपूर्ण है दसवेआलियं: आचार्यश्री -
- आचार्यश्री ने समणियों को वैरागी-वैरागण की खोज करने की विशेष प्रेरणा -
- दसवेआलियं ग्रंथ का अध्ययन करने की दी प्रेरणा, साध्वीवर्याजी ने भी लोगों को किया उत्प्रेरित -
आचार्यश्री महाश्रमणजी

          04 फरवरी 2017 राधाबाड़ी, जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) (JTN) : शनिवार को राधाबाड़ी स्थित तेरापंथ भवन परिसर के पास में बने मर्यादा समवसरण के प्रवचन पंडाल में उपस्थित साधु-साध्वियों और समणियों को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने विशेष प्रेरणा प्रदान की। साधु-साध्वियों को अपने साधुत्व के प्रति जागरूक रहने, साधुत्व के नियमों को परिपुष्ट बनाने के लिए दसवेआलियं ग्रंथ का विशेष अध्ययन करने और समणियों को धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ वैरागी-वैरागण बनाने की विशेष प्रेरणा प्रदान की। 
शनिवार को उपस्थित श्रद्धालुआंे को सर्वप्रथम साध्वीवर्याजी ने अभिप्रेरित करते हुए कहा कि व्यक्ति जन्म लेता है, कर्म करता है और मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना तो एक चक्र है, किन्तु जन्म और मृत्यु के बीच के समय को आदमी कैसे जिए, यह महत्त्वपूर्ण बात होती है, इसका चिन्तन आदमी को करना चाहिए। धर्म में लगाया गया समय सफल हो सकता है। आदमी को समय का नियोजन करने का प्रयास करना चाहिए और यथासंभव धर्म में नियोजित कर अपने जीवन का कल्याण करने का प्रयास करना चाहिए। बोला हुआ शब्द, हाथ से छुटा अवसर और बीता हुआ पल कभी वापस नहीं हो सकता। इसलिए आदमी समय के एक-एक पल का सही उपयोग करना सीखे। जागरूकता को धर्म बताते हुए कहा कि खाने, चलने, उठने, बैठने, सोने और प्रत्येक काम जागरूकता पूर्वक करने का प्रयत्न कर आदमी अपने समय और जीवन को सार्थक बना सकता है। यतनापूर्वक अपने कार्य को आदमी पाप कर्मों के बंधन से स्वयं को बचा सकता है। इसलिए आदमी समय का अंकन कर अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करे। 
इसके उपरान्त आचार्यश्री ने उपस्थित साधु-साध्वियों और समणियों को अपनी विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि 32 आगमों में एक महत्त्वपूर्ण आगम है दसवेआलियं। इसे कितने-कितने साधु-साध्वियां मुखस्थ-कंठस्थ करते हैं। इसमें साधुओं के नियमों और करणीय, अकरणीय कार्यों का पूर्ण विवरण प्रस्तुत किया गया है। गोचरी, भिक्षा, विनय समाधी आदि के बारे में विषय में विस्तार से बताया गया है। विनय और समाधी की व्याख्या इसके नवें अध्ययन में की गई है तो भिक्षु को कैसा होना चाहिए, इसके बारे में दसवें अध्ययन में वर्णन मिलता है। सातवें अध्ययन में साधु को बोलने के बारे में बताया गया है। साधु जो साधु मितभाषी और दोष रहित भाषा बोलने वाला और जागरूकतापूर्वक बोलने वाला होता है, वह साधु प्रशंसा को प्राप्त कर सकता है। साधुपन के पालन के लिए काम और इच्छाओं को दूर करने का सूत्र दूसरे अध्ययन में प्रतिपादित किया गया है। इसमें राग भाव को दूर करने का आलंबन प्राप्त होता है। आचार्यश्री ने दसवेआलियं के निर्माण की भी व्याख्या की और साधु-साध्वियों को इसका अध्ययन कर अपने साधुपन को पूरी निष्ठा और जागरूकता से पालन कर अपनी आत्मा का कल्याण के दिशा में आगे बढ़ने के लिए उत्प्रेरित किया। आचार्यश्री ने समुपस्थित समणियों को विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि समणीवृन्द कितना पढ़ी-लिखी होती है। कोई विदेश में जाने वाली, भाषण देनेवाली, कुलपति बनने वाली, अध्यापन कराने वाली होती हैं। वे जहां भी जाएं धर्म और ज्ञान की प्रेरणा के साथ ही वैरागी और वैरागण की खोज करने या इसके लिए भव्य आत्माओं की खोज करने का भी प्रयास करना चाहिए। जब कुछ समणियों का समूह कहीं जाए तो उसमें एक समणी का यहीं कार्य हो तो धर्मसंघ और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। खोजने से कुछ प्राप्त भी हो सकता है। समणिया सलक्ष्य और योजनाबद्ध प्रयास करें तो कुछ मिल सकता है।
          कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय अणुव्रत शिक्षक संसद के अध्यक्ष श्री तनसुखलाल बैद ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी तो वहीं जैन विश्वभारती के पूर्व अध्यक्ष श्री धर्मचंद लूंकड़ संग आंचलिया परिवार के सदस्यों ने ‘मन से मानवमित्र’ पुस्तक को आचार्यश्री के चरणों समर्पित कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 





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