सुखी बनने के सूत्र - आचार्य श्री महाश्रमण

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          बहादुरगंज, 21 फरवरी 2017, (JTN) : जैन श्वेताम्बर तेरापन्थ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ लोहागाड़ा से लगभग 10 किलोमीटर का विहार कर अग्रसेन भवन  बहादुर गंज पधारे। जहा आचार्य श्री का भव्य स्वागत किया गया। 
         तेरापन्थ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने प्रातःकालीन उदबोधन में फ़रमाया की शास्त्रकार ने संसार के सुखी होने के सूत्रों में पहली बात यह बतायी है सुखी होने के लिए आदमी को कष्ट सहिष्णु बनना चाहिए कठोरता को झेलने का उसमे इरादा होना चाहिए। आदमी किंचित भी कष्ट स्वीकार नही करना चाहता है तो सुकुमारता को छोड़ो। कठोरता को भी झेल सको ऐसी स्थिति का निर्माण करो और अपने करणीय कार्य को सम्पन्न करने का प्रयास कर सके। तो सुखी होने का एक उपाय है जीवन में कठिनाइया भी आ सकती है। शारीरिक सहिष्णुता का भी महत्व है और मानसिक सहिष्णुता का भी कितना महत्व है मन के प्रतिकूल कुछ हो जाये उसको हम झेल सके शांति रखे तो आदमी में मानसिक  सहिष्णुता भी होनी चाहिए। मन के प्रतिकूल स्थिति में  भी हम  गुस्सा न करे। गुस्सा भी एक तरह का नशा है। तो यह गुस्सा असहिष्णुता का निष्पद है तो हम शारीरिक दृष्टि से भी सहन करने का अभ्यास रखे ।और मानसिक प्रतिकूल स्थिति में भी शांत रहने का प्रयास करे। कामनाओ को कम करने का प्रयास करे संतोष धारण करने का प्रयास करे। ईर्ष्या भाव को छोड़ने का प्रयास करे। हम द्वेष ईर्ष्या को छोड़े और राग भाव को छोड़ने का प्रयास करे। इस् प्रकार आदमी जीवन में संसार में सुखी रह सकता है। आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अहिंसा यात्रा के तीन उद्देश्य सद्द्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के बारे में बताया और बहादुरंगज वाशियो से भी इसके तीन संकल्प सद्भावपूर्ण व्यवहार करने यथासम्भव ईमानदारी का पालन करने और नशामुक्त जीवन जीने को स्वीकार करने का आह्वान किया। आचार्य श्री के स्वागत में तेरापन्थ महिला मंडल और तेरापन्थ कन्यांमण्डल ने पूज्य प्रवर के समक्ष गीत की प्रस्तुति दी। विधानपरिषद के सदस्य डॉ.दिलीप जैस्वाल , पन्नालाल जी संचेती , सुशील संचेती , महासभा के बिहार प्रभारी श्री रामकरण जी दफ्तरी और पवन अग्रवाल ने , पूज्य प्रवर के स्वागत में अपने विचारों की अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रदीप संचेती ने किया।








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