भोग से योग की ओर, राग से त्याग की ओर बढ़े - आचार्यश्री महाश्रमण

पूज्यप्रवर ने निर्मली में दी आत्मा को निर्मल बनाने की प्रेरणा 
आचार्यश्री महाश्रमणजी

          09 मार्च 2017, निर्मली (बिहार) (JTN) । मानवता के मसीहा, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमण जी अपनी जन कल्याणकारी अहिंसा यात्रा के साथ निर्मली ग्राम पधारे। अपने प्रात:कालीन प्रवचन में निर्मली वासियों को निर्मल बनने की प्रेरणा दी। परमपूज्य आचार्यश्री ने फ़रमाया कि अर्हत वांग्मय में कहा गया है- एक अनुस्त्रोत होता है, दूसरा प्रतिस्त्रोत होता है। प्रवाह के साथ बहना अनुस्त्रोतगामिता है और प्रवाह के प्रतिकूल चलना प्रतिस्त्रोतगामिता हो जाती है। संसार में आदमी भोग में रहता है यह अनुस्त्रोतगामिता है, त्याग तप के पथ पर चलता है यह प्रतिस्रोतगामिता हो जाती है। दुनिया में भोग चलता है, योग भी चलना चाहिए। हमारे जीवन में भोग की प्रधानता न रहे। भोग चलता है तो योग भी चलना चाइए। राग चलता है तो त्याग भी चलना चाहिए। योग से आत्मा का पोषण होता है और भोग से आत्मा का शोषण हो सकता है। हम आत्मा पर ध्यान दें। आत्मा को पुष्ट बनाने के लिए त्याग-संयम की अपेक्षा होती है। आदमी खाने-पीने,-सोने को अच्छा मिले, अच्छा कपड़ा पहने, अच्छा मकान अच्छी सुख-सुविधा, इंद्रिय विषयों के भोग में ज्यादा रुचि लेता है तो मानना चाहिए अनुस्त्रोतगामी ज्यादा है और संयम का  अभ्यास करें तो प्रतिस्त्रोतगामिता हो जाती है। 

          आचार्यप्रवर ने आगे फरमाया- परमपूज्य आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन की बात बताई। अणुव्रत भी एक प्रतिस्त्रोतगामी बनने का उपाय है।,परमपूज्य आचार्य महाप्रज्ञजी में अहिंसके चेतना का जागरण और नैतिक मूल्यों के विकास का संदेश दिया था, ये भी एक प्रतिस्त्रोतगामिता का संदेश है।  जीवन में त्याग जितना बढ़ेगा  हमारी आत्मा का कल्याण होगा और जीवन में राग जितना ज्यादा होगा, भोग जितना ज्यादा होगा आत्मा का शोषण होगा। हमें आत्मा का शोषण न हो ऐसा प्रयत्न करना चाहिए पर आत्मा का पोषण हो वैसा प्रयास जरूर करना चाहिए। यानी भोग से योग की ओर आगे बढ़ना चाहिए, राग से त्याग की ओर आगे बढ़ना चाहिए, मनोरंजन से आत्मरंजन की ओर आगे बढ़ना चाहिए।  

          पूज्यप्रवर ने गीत की पंक्तियों का संगान किया- "भोग ही क्या जिंदगी का लक्ष्य है, त्याग से हर मनुज का उद्धार है। योग बिना जिंदगी बेकार है, साधना ही शांति का आधार है।" जीवन में त्याग-संयम बढ़े। खाने का सयम करें, नशे का परित्याग करें। नशा आदि यह सब भोग ही तो है। आदमी शराब पी लेता है, गुटखा खा लेता है, बीड़ी-सिगरेट पी लेता है। 

          आचार्यप्रवर ने संस्कृत श्लोक के माध्यम से बताया कि- भोगों को हमने क्या भोगा, भोगों ने हमें भोग लिया।  काल क्या बीता, हम बीत गए। तप क्या तपा, हम खुद तनाव-चिंताओं से संतप्त हो गए और तृष्णा क्या बुड्ढी हुई, हम बुड्ढे हो गए। भोगों को हमने क्या भोगा, भोगों ने हमें भोग लिया। आदमी पहले शराब पीता है फिर शराब आदमी को पीने लग जाती है, पहले आदमी गुटखा खाता है फिर गुटखा मानो आदमी को खाने लग जाता है । काल क्या बीता हम खुद बीत गए। बच्चे थे वह जवान हो गए, जवान थे वो बुड्ढे और बुड्ढे थे वो आगे और आगे चले गए। और तृष्णा क्या बुड्ढी हुई, हम बुड्ढे हो गए। बुड्ढा होने के बाद तृष्णा कभी-कभी बनी रह सकती है। इसलिए भोग का मार्ग संसार का मार्ग है योग का मार्ग अध्यात्म का मार्ग है। राग संसार का मार्ग है और त्याग मोक्ष का मार्ग है।

          आचार्यप्रवर ने निर्मली गाँव अहिंसा यात्रा के दुसरी बार पदार्पण को बोनस बताया और गाँव के नाम अनुरूप निर्मलीवासियों को आत्मा को निर्मल बनाने की प्रेरणा दी।  आचार्यप्रवर की प्रेरणा से निर्मलीवासियों ने अहिंसा यात्रा के तीनों संकल्प - 1. मैं सद्भावपूर्ण व्यवहार करने का प्रयत्न करूंगा 2. मैं यथासंभव इमानदारी का पालन करूंगा 3. मैं नशा मुक्त जीवन जीवन का प्रयास करूँगा, इन तीनों संकल्पों को ग्रहण किया।












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