समता की साधना से होती है भावों की शुद्धि : आचार्य श्री महाश्रमण

आचार्यश्री महाश्रमणजी

          लोहाना पूर्व , 13 मार्च , 2017 (JTN) : तेरापंथ धर्म संघ के ग्याहवें अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण अहिंसा यात्रा के माध्यम से सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का संदेश प्रदान करते हुए आज बिहार प्रांत के लोहाना पूर्व में पधारें । प्रातःकालीन प्रवचन में श्रावको एवं ग्रामीण जनता को उद्बोधित करते हुए पूज्यप्रवर ने फरमाया - आर्हत वांग्मय में कहा गया है  आदमी के पास प्रवृति के तीन साधन होते हैं , शरीर , वाणी और मन । शरीर के द्वारा मनुष्य खाना ,पीना , सोना आदि अनेक प्रवृतियां करता है । वाणी के द्वारा आदमी बोलता है, भाषण देता है , गाता है , ध्वनि करता है , वाचिक प्रवृति का साधन वाणी है । मन के द्वारा चिंतन, स्मृति, कल्पना ,विचारणा यह मन के द्वारा की जाने वाली प्रवृति है । शरीर हमारे सामने है । वाणी का प्रयोग जिनसे होता है वे मुख आदि अवयव हमारे सामने है, शरीर में है और मन में जो चिंतन चलता है वह चिंतन किस आदमी के मन में क्या चिंतन है  पूरा पता नहीं चलता है । मनःपर्यव ज्ञानी कोई मुनि हो तो उसको जानकारी हो सकती है या अतीन्द्रिय ज्ञानी हो तो उसे जानकारी हो सकती है कि सामने वाले व्यक्ति के मन में क्या विचार आ रहा है, वह क्या सोच रहा है ।सोचना चूँकि आवृत होता है, भीतर में होता है अतः आदमी निश्चिन्त रहता है भले कुछ भी सोचूं दूसरों को क्या पता चलेगा । शरीर से कोई काम करे तो दूसरों को पता भी चल जाता है पर मन में क्या विचार आ रहा है ये दूसरों से छिपा हुआ रहता है । दूसरों से भले छिपा हुआ रह जाए अनन्त सिद्धों से छिपा हुआ नहीं रह सकता, केवलज्ञानियों से , विशिष्ट ज्ञानियों से , अतीन्द्रिय ज्ञानियों से छिपा हुआ नहीं रह सकता और मन से खराब चिंतन होता है तो पाप कर्म का बंध हो जाता है । पाप किसी का बाप नहीं । जो भी गलत प्रवृति करेगा उसके पाप का बंध हो जाता है । 
        मन एवं भाव के संबंध की विवेचना करते हुए आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि मन भाव का ग्रहण करने वाला होता है । जैसे स्पृशनेंद्रिय का विषय है स्पर्श, रसनेन्द्रिय का विषय है रस , घ्राणेंद्रिय का विषय है गंध , चक्षुरिन्द्रिय का विषय है रूप , श्रोतेंद्रिय का विषय है शब्द वैसे मन का विषय है भाव । भाव मनोज्ञ आने पर आदमी राग में जा सकता है, अमनोज्ञ आने पर आदमी द्वेष में जा सकता है । आचार्य प्रवर ने संस्कृत श्लोक की व्याख्या करते हुए आगे फरमाया कि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है । भाव ही कारण है बंधन और मोक्ष का । जिसकी जैसी भावना होती है वैसी ही सिद्धि हो जाती है । हमे ध्यान यह देना चाहिए कि मेरे विचार ,मेरे भाव निर्मल रहे । अशुद्ध भाव न रहे । आदमी वाणी से बुरा बोलता है, शरीर से गलत काम करता है इसका मतलब है उसके भाव खराब है । भाव खराब है तब आदमी शरीर और वाणी से गलत काम करता है । पूज्य प्रवर ने कुएं और बाल्टी का उदाहरण देते हुए फरमाया कि  कुएं में जैसा पानी होगा बाल्टी में वैसा ही पानी आता है उसी प्रकार जैसे हमारे मन रूपी कुएं में जैसे भाव उभरते है उसके अनुसार आदमी शरीर और वाणी से अच्छा या गलत कार्य करता है । हमारे भाव शुद्ध रहेंगे तो हमारी वाणी अच्छी रह सकेगी और शरीर की प्रवृतियां अच्छी रह सकेगी ।    आचार्य श्री ने महामना भिक्षु को याद करते हुए उनके साहित्य में वर्णित राजस्थानी पद्य की व्याख्या करते हुए फरमाया कि मन , वचन ,काय की प्रवृतियों को उज्जवल बनाने के लिए मोह एक महत्वपूर्ण तत्व है । मोह कर्म अलग है, मोह कर्म का वियोग है तो शरीर , वाणी ,मन की प्रवृतियां अच्छी रह सकेगी और मोह कर्म का संयोग है, राग द्वेष का भाव जुड़ गया है तो मन , वचन , काया की प्रवृतियां मैली हो जायेगी, मलिन हो जायेगी । यह मोह कर्म भाव से जुड़ा हुआ है । मोह का प्रभाव भाव में है तो भाव का प्रभाव वाणी , मन में , शरीर में और प्रवृति में आने वाला है । 
       पूज्यप्रवर ने पूज्य गणाधिपति गुरुदेव तुलसी एवं आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी को याद करते हुए कहा कि भाव शुद्धि के लिए गुरुदेव तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने प्रेक्षाध्यान को प्रस्तुत किया था । प्रेक्षाध्यान चित्त शुद्धि के लिए , भाव शुद्धि के लिए । हमारी चित्त की शुद्धि हो जाए , भाव की शुद्धि हो जाए इसलिए प्रेक्षा ध्यान का प्रयोग । चित्त शुद्ध होगा तो अपने से अपने को देखा जा सकेगा , वरना अपने आप को देखना जानना बड़ा मुश्किल काम है । भावों में परिवर्तन हो जाता है । एक कथानक के माध्यम से पूज्यप्रवर ने भाव में परिवर्तन की स्तिथी का विवेचन किया । राग आदमी को दुखी बनाता है । जहां कामना है , राग है, वृद्धि है वह दुःख का मूल कारण है । उत्तरझयणाणि में कहा गया - विषयों के प्रति आसक्ति से दुःख उत्पन्न होता है । सारे लोक में भले देवता हो , मनुष्य हो या नरक दुःख का मूल कारण राग ही है ।जो वीतराग बन जाता है , राग मुक्त बन जाता है वह दुःख का पार पा लेता है, दुःख का अंत हो जाता है । अध्यात्म की साधना दुःख का अंत करने की साधना होती है । संसार में दुःखी एवं सुखी दोनों तरह के प्राणी है । एक आदमी के जीवन में कभी दुःख होता है तो कभी सुख ऐसा होता रहता है । दुःख में सुख एवं सुख में दुःख आ सकता है । हमारे कर्मो के अनुसार ऐसी स्थितियां जीवन आ सकती है । हमारा प्रयास यह रहना चाहिए कि हम समता भाव में रहे । भाव शुद्धि के लिए समता में रहने का प्रयास करें । सुख में ज्यादा खुशी न मनाए और दुःख में निराश , हताश , शोकाकुल न बने , समता का अभ्यास करें । समता का अभ्यास रहेगा तो भाव शुद्ध रह सकेंगे , भाव अच्छे रह सकेंगे । साधना की एक बात है हम अपने भावों को शुद्ध रखने का प्रयास करें । किसी के लिए अनिष्ट न सोचें , हो सके तो किसी के लिए मंगलकामना करें । सब शान्ति को प्राप्त करें , सब कल्याण को प्राप्त करें , सब क्षमाशीलता को प्राप्त करें । सब सुखी बने , सब निरोग रहें , सब कल्याणो को देखें, कोई भी दुःख का भागी न बने यह पवित्र भावना करें । खुद का मंगल हो, दूसरों का भी मंगल हो और मंगल आत्माओं का स्मरण करें । अरिहंत मंगल है, सिद्ध मंगल है , साधू मंगल है और केवली धर्म उत्कृष्ट मंगल है । जो धर्म की साधना करेगा उसका कल्याण हो जाएगा । जिसका मन सदा धर्म में रमा रहता है उसे तो देवता भी नमन करते हैं । पूज्य प्रवर ने धर्म एवं समता की साधना द्वारा भावना को शुद्ध बनाने की प्रेरणा दी ।

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