वाणी संयम मनुष्य जीवन का आभूषण : आचार्यश्री महाश्रमण

- अहिंसा यात्रा संग शांतिदूत के आगमन से पावन हुआ बोचहां -
- आचार्यश्री ने अपनी वाणी से लोगों को किया अभिसिंचत -
आचार्यश्री महाश्रमणजी

20.03.2017 बोचहां (मुजफ्फरपुर)ः सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के उद्देश्यों से संतृप्त, मानवता के महा मसीहा, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा प्रणित अहिंसा यात्रा सोमवार को जब मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां स्थित इन्द्रप्रस्थ इंटरनेशनल स्कूल पहुंची तो उक्त नगर के साथ ही स्कूल का प्रांगण भी ऐसे महासंत के चरणरज पाकर पुलकित हो उठा। ऐसे महापुरुष के चरणरज से गांव और स्कूल की मिट्टी पावन हो गई। 
सोमवार की सुबह लगभग नौ बजे जब आचार्यश्री अपनी श्वेत सेना के साथ बोचहां स्थित इन्द्रप्रस्थ इन्टरनेशनल स्कूल में पहुंचे तो सभी नगरवासी आचार्यश्री के दर्शन करने को स्कूल में उमड़ पड़े। आचार्यश्री ने सभी नागरिकों को अपना मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। 
इसके उपरान्त स्कूल प्रांगण में ही बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने बोलने की कला सिखाते हुए कहा कि आदमी को कभी भी बिना पूछे नहीं बोलने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को बोलने में विवेक रखने का प्रयास करना चाहिए। जब तक कहीं पूछा न जाए आदमी को अपने ज्ञान को उजागर करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। मौन को आचार्यश्री ने पंडितों और अपंडितों का विभूषण बताते हुए कहा कि मूखों के बीच में पंडितों को मौन हो जाना चाहिए और पंडितों के बीच मूर्खों को मौन हो जाना चाहिए। इस प्रकार मौन पंडित और अपंडित दोनों का विभूषण होती है। आदमी से जब कुछ पूछा जाए तो आदमी को झूठ नहीं सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए। सत्य बोलना कठिन हो सकता है, किन्तु आदमी को सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए। यदि आदमी सत्य बोलने की हिम्मत न कर सके तो मौन हो जाए तो भी वह अपनी वाणी को संयमित कर सकता है और झूठ बोलने वाले पाप से भी बच सकता है। आदमी को अपने गुस्से को असत्य करने का प्रयास करना चाहिए। मन में कभी गुस्सा भी आए तो वाणी से गाली के रूप में या हाथ से मारपीट में प्रकट करने से रोकने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा प्रकार कर आदमी अपने गुस्से को असत्य कर सकता है। गुस्सा कमजोरी को प्रदर्शित कर सकता है। आदमी को ऐसा प्रयास करना चाहिए कि मन में भी गुस्सा न आए। 
आचार्यश्री ने लोगों को समता भाव रखने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को प्रिय और अप्रिय को धारण करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी के जीवन में कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल स्थितियां आ सकती हैं। ऐसे आदमी को अनुकूल स्थितियों में अधिक प्रसन्न और प्रतिकूल स्थितियों में अत्यधिक दुःखी होने से बचने का प्रयास करना चाहिए और सम भाव से दोनों परिस्थितियों को स्वीकार करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी प्रतिकूलता में भी समता भाव रखे तो जीवन की कितनी बुराइयों से अपने आप को बचा सकता है। 
प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने उपस्थित स्थानीय लोगों को अहिंसा यात्रा के तीन संकल्पों की अवगति प्रदान करते हुए इन संकल्पों से जुड़ने का आह्वान किया तो आचार्यश्री के आह्वान पर उपस्थित लोगों ने अहिंसा यात्रा के तीनों संकल्प सद्भावपूर्ण व्यवहार करने, यथासंभव ईमानदारी का पालन करने व पूर्णतया नशामुक्त जीवन जीने के संकल्पों को स्वीकार किया। 





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