राग-द्वेष से मुक्त जीवन जीने का प्रयास करें : आचार्यश्री महाश्रमण

- भगवान महावीर के जन्मस्थली पहुंचे भगवान महावीर के प्रतिनिधि -
- दिगम्बर जैन समाज के आचार्य शीतलसागरजी महाराज से आचार्यश्री का हुआ मिलन -
- आचार्यश्री शीतलसागरजी ने आचार्यश्री को दी भगवान की संज्ञा, अहिंसा यात्रा को बताया कल्याणकारी -
आचार्यश्री महाश्रमणजी

          23.03.2017 वासु कुण्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) (JTN) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, शांतिदूत, कीर्तिधर पुरुष आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी कल्याणकारी अहिंसा यात्रा के साथ वैशाली के वासुकुण्ड गांव स्थित भगवान महावीर की जन्मस्थली पहुंचकर तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में एक और नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। यहीं नहीं इसके साथ ही दिगम्बर समाज के आचार्यश्री शीतलसागरजी के साथ प्रवचन मंच पर उपस्थित हुए और दोनों आचार्यों ने एक साथ उपस्थित जनता को धर्म के प्रति उत्प्रेरित भी किया। भगवान महावीर की जन्मस्थली में दो संप्रदायों का आचार्यों का मिलन ऐसे ऐतिहासिक हो गया जैसे गंगा-जुमना का मिलन। एक भगवान की दो धाराओं का मिलन अपने आपमें अविस्मरिणय रहा। इस दौरान सैकड़ों श्रद्धालुअ इस अवसर के साक्षी बने। 
पूरे विश्व में प्रथम गणराज्य के रूप में विख्यात वैशाली क्षेत्र में स्थित वासोकुंड जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर और जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता है। गुरुवार को आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ भगवान महावीर की जन्मस्थली की ओर विहार किया। लगभग तेरह किलोमीटर का विहार कर जब आचार्यश्री भगवान महावीर की जन्मस्थली गांव वासोकुण्ड की सीमा में पहुंचे तो लोग सहसा बोल उठे भगवान महावीर के प्रतिनिधि आज स्वतः भगवान महावीर की जन्मस्थली पधार गए हैं। आचार्यश्री जैसे ही भगवान महावीर के जन्मस्थल परिसर के समीप पहुंचे जैन दिगम्बर समाज के आचार्यश्री शीतलसागरजी महाराज आचार्यश्री की अगुवानी को मुख्य द्वारा पर पहुंचे। एक भगवान के दो दो धाराओं के प्रमुखों का मिलन गंगा-जुमना के मिलन से कम नहीं था। दोनों जब एक-दूसरे से शिष्टता के साथ मिल रहे थे तो पूरा गांव विभिन्न जयघोषों से गूंज रहा था। इसके साथ ही भगवान महावीर स्मारक समिति के पदाधिकारियों व सदस्य भी आचार्यश्री का स्वागत किया और उन्हें मंदिर परिसर में ले आए। 
दोपहर लगभग साढ़े बारह एक साथ एक भगवान के दोनों धाराओं के प्रमुख एक साथ मंचासीन हुए तो श्रद्धालुओं ने पुनः गगनभेदी जयघोष लगाया। उपस्थित जन समुदाय को अपनी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि दुनिया में हर प्राणी दुःख को प्राप्त होता है। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई छदमस्त होगा जिसे दुःख नहीं होता। दुःख होता है तो उसका कारण भी होता है। दुःख की उत्पत्ति का कारण विषयों के प्रति आसक्ति है। राग-द्वेष के भाव ही दुःख के उत्पत्ति के मुख्य कारण होते हैं। आदमी को दुःखों से पार पाने के लिए अपनी इच्छाओं का सीमित और राग-द्वेष के भाव से दूर रहने का प्रयास करना होगा। भगवान महावीर राग-द्वेष की भावनाओं से मुक्त और समता के साधक थे। इसके सामने और अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियां आईं, किन्तु वह दोनों ही परिस्थितियों में समता भाव में रहे। अहिंसा भी समता का ही एक रूप है। आचार्यश्री ने अहिंसा यात्रा के मुख्य उद्देश्य सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का भी विवेचन किया। आचार्यश्री ने कहा कि आज शीतलसागरजी से मिलना हो गया। आज भगवान महावीर के जन्मस्थली में मिलन हो गया। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी भी विद्यानन्दजी महाराज से बहुत बार मिलते थे। अहिंसा यात्रा आज बिहार के वैशाली क्षेत्र जो भगवान महावीर की जन्मभूमि भी है, पहुंची है। यहां के लोगों में भी भगवान महावीर की भांति समता और अहिंसा की भावना जागृत हो सके। 
आचार्यश्री शीतलसागरजी महाराज ने कहा कि आज का दिन अत्यन्त पावन है। मेरा मन प्रसन्न है। श्वेताम्बर तेरापंथ के सिद्ध आचार्यश्री महाश्रमणजी का भगवान महावीर की जन्मस्थली में आना हुआ है। दिगम्बर और श्वेताम्बर के आचार्यों का एक मंच पर भगवान के मंदिर में उपस्थित होना कोई सामान्य बात नहीं, महत्त्वपूर्ण बात है। उन्होंने आचार्यश्री द्वारा प्रणित यात्रा का विस्तार से वर्णन किया और आचार्यश्री महाश्रमणजी को भगवान के समान बताते हुए कहा कि आज के समय में समस्त परिग्रहों का त्याग कर लोगों को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का संदेश देना और लोगों के जीवन को उत्कृष्टता की ओर ले जाना किसी भगवान के कार्य से कम नहीं है। उन्होंने दोनों संप्रदायों को होकर भगवान महावीर की बातों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भी श्रद्धालुओं को अभिप्रेरित किया। 
इसके पूर्व तेरापंथ धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने भी श्रद्धालुओं को अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि बिहार की धरती अपने आप में धन्यता और कृतपुण्यता का अनुभव कर रही है जहां भगवान महावीर का जन्म, लालन-पालन और शिक्षा हुई। यहां के लोग भी धन्य हैं। आज भगवान महावीर की दो परंपराओं के आचार्यों का मधुर मिलन ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा कि दोनों आचार्यों द्वारा की जाने वाली अमृतवर्षा का हम सभी समतल भूमि बनकर श्रवण कर अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करें। 
कार्यक्रम के प्रारम्भ में ही भगवान महावीर स्मारक समिति के अर्थव्यवस्था अध्यक्ष श्री सतीशचन्द्र जैन, कार्यकारी अध्यक्ष श्री अनिल जैन व नेपाल-बिहार तेरापंथी सभा की ओर से राजेश पटावरी ने भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी और दोनों आचार्यों से शुभाशीष प्राप्त किया। 




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