पापों से बचाती है अनुकंपा और दया की भावना : आचार्यश्री महाश्रमण

🔹 गंगा को पार कर तेरापंथ के भगीरथ का अहिंसा यात्रा संग पटना में भव्य प्रवेश
🔹 दुनिया के सबसे बड़े पुल महात्मा गांधी सेतु पुल को महातपस्वी आचार्य ने अपने चरणरज से किया पावन
🔹 स्वागत में बिछ गई बिहार की राजधानी पटना, स्वागत को उमड़ा जनसमूह 
🔹 विशाल भव्य जुलूस के साथ पहुंची कंकड़बाग स्थित अवसर हाॅल 
🔹 44 दिन लगातार विहार के बाद आचार्यश्री यहां करेंगे चार दिवसीय प्रवास 
आचार्यश्री महाश्रमणजी

          27 मार्च 2017 कंकड़बाग (बिहार) (JTN) : जन-जन के मानस में सद्भावना के बीज वपन करने, मानव-मानव को नैतिकता का पाठ पढ़ाने और नशामुक्त जीवन जीने की सत्प्रेरणा देने के लिए अपनी श्वेत सेना के साथ अहिंसा यात्रा पर निकले जैन श्वेतम्बार तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें देदीप्यमान महासूर्य, शांतिदूत, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी सोमवार को गंगा नदी को पार कर बिहार की राजधानी पटना में भव्य प्रवेश कर तेरापंथ धर्मसंघ की कीर्ति में एक नया अध्याय जोड़ दिया। क्योंकि लगभग 58 वर्षों बाद एक बार पुनः पटना की धरती पर तेरापंथ के सरताज का आगमन हुआ था। आचार्यश्री विशाल जनसमूह के साथ नगरवासियों पर अपनी आशीषवृष्टि करते कंकड़बाग स्थित अवसर हाॅल परिसर में पहुंचे। 
सोमवार को सुबह जब सूर्य अपनी रश्मियों के साथ क्षीतिज पर मानव के जीवन में एक नया अध्याय लिखने को आगे बढ़ रहा था तो वहीं धरती पर भी तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी भी अपनी श्वेत रश्मियों के साथ धर्मसंघ के इतिहास में और बिहार के गौरवशाली में इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ने को गतिमान हो चुके थे। जदुआ, हाजीपुर स्थित होमगार्ड बैरक से लगभग दो किलोमीटर बाद ही पूरी दुनिया में अपनी पवित्रता, निर्मलता के साथ भारतीय सभ्यता, और संस्कृति के लिए सुप्रसिद्ध गंगा नदी पर बने दुनिया के सबसे बड़े पुल महात्मा गांधी सेतु पुल पर महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणरज पड़े। ऐसे महासंत के चरणरज को पाकर गंगा नदी पर बना यह पुल भी धन्य हो गया। यह गांधाी सेतु पुल पूरी दुनिया में किसी एक नदी पर बना यह सबसे बड़ा पुल है। लगभग 5.75 किलोमीटर की लंबाई वाले इस पुल का शुभारम्भ वर्ष 1982 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा किया गया था। ऐसे पुल पर जब मानवता के मसीहा के चरणरज पड़े तो इस पुल की ख्याति में चार चांद लग गए। पुल की व्यवस्तता को देखते हुए पुल के पूर्वी हिस्से से अस्थाई पीपा पुल का भी निर्माण किया गया था जिसके ऊपर से छोटे वाहन गंगा को पार कर रहे थे। आचार्यश्री ने इस पुल पर लगभग डेढ़ घंटे की पदयात्रा की। पुल के पार होते ही आचार्यश्री ने उस पावन नगरी का स्पर्श किया जहां सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह का जन्म हुआ था। जो कभी पाटलीपुत्र के नाम से विख्यात था और उस समय भी राज्य की राजधानी ही था। यहीं नहीं इस नगर को तेरापंथ धर्मसंघ के नवमेंधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी का भी चरणरज प्राप्त था जो आज से लगभग 58 वर्ष पूर्व अपनी पूरब की यात्रा के दौरान यहां पहुंचे थे। 
सोमवार को एक बार पुनः इतिहास अपने आपको को दोहरा रहा था। तेरापंथ के ग्यारहवें अधिशास्ता का पूरा नगर पलक-पांवड़े बिछाए प्रतिक्षा कर रहा था और बिछे क्यों न सिलीगुड़ी के बाद लगातार 44 दिन की यात्रा के बाद अहिंसा यात्रा के प्रणेता यहां चार दिवसीय प्रवास के लिए पहुंच रहे थे। तेरापंथी परिवारों के साथ अन्य जैन एवं जैनेतर समुदाय के लोग भी इस महापुरुष के स्वागत और दर्शन के लिए लालायित नजर आ रहा था। आचार्यश्री के पटना नगर की सीमा में प्रवेश करते ही उपस्थित जनसमूह ने गगनभेदी जयघोष के साथ स्वागत किया। स्कूली बच्चों संग तेरापंथ धर्मसंघ के विभिन्न संगठनों के सदस्यों ने गणवेश धारण कर अपने आराध्य के स्वागत के लिए पहुंचे हुए थे। आचार्यश्री के पहुंचते ही जन समूह जुलूस में परिवर्तित हो गया और अपने आराध्य का अभिनन्दन करते हुए कंकड़बाग स्थित अवसर हाॅल पहुंचा। 
अवसर हाॅल में में बने सद्भावना समवसरण मंच से सर्वप्रथम असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने लोगों को अपनी ममतामयी वाणी से अभिसिंचन प्रदान किया। उसके उपरान्त मंच पर विराजे तेरापंथ के सरताज आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आदमी के जीवन में अनुकंपा, दया एक सद्गुण है। जिस आदमी के भीतर दया होती है वह कितने पापों से बच सकता है। दया एक कवच के समान है, जो पापों को मानव के भीतर में प्रवेश करने से रोकती है। अहिंसा की भावना भी तभी पुष्ट होती है जब आदमी के हृदय में दया और अनुकंपा के भाव होते हैं। आदमी को दुःखी आदमी के प्रति दया का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। जगत् के सभी प्राणियों पर दया कर तीर्थंकर प्रवचन करते हैं। प्रवचन करना भी दया है। इसके माध्यम से कितने लोगों को प्रबोध दिया जा सकता है और लोगों का कल्याण किया जा सकता है। साधु स्वयं हितोपदेशक और श्रोताओं पर अनुग्रह करने वाला होता है। आचार्यश्री ने कहा कि आदमी के भीतर दया और अनुकंपा की भावना आए तो उसके भीतर सद्भावना और नैतिकता के भाव भी पुष्ट हो सकते हैं। 
आचार्यश्री ने पटना आगमन के संदर्भ में कहा कि आज हम पटना पहुंचे हैं और हमारे नवमें परमपूज्य आचार्यश्री तुलसी जब पटना पधारे थे तो तब तो हम धरती पर भी नहीं आए थे। हमारी साध्वीप्रमुखाजी भी उस समय मुमुक्षु रूप में थी। दीक्षा के बाद उनका भी पटना में पहली बार आगमन हुआ है। यहां के लोगों में सद्भावना, नैतिकता का विकास हो, जीवन नशामुक्त बनें और लोगों के जीवन में सुख, शांति बनी रहे। आचार्यश्री के आह्वान पर उपस्थित लोगों ने सस्वर अहिंसा यात्रा के संकल्पों को स्वीकार किया। 
वहीं चतुर्दशी तिथि होने के कारण आचार्यश्री के सन्निधि में समस्त साधु-साध्वियों ने अपनी मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहने और संघ-संघपति के प्रति समर्पण भाव को दोहराया तो वहीं आचार्यश्री ने हाजरी पत्र का वाचन किया। 
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री तनसुख बैद ने अपने आराध्य देव के आगमन पर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया और आचार्यश्री सहित मुख्य अतिथियों का स्वागत किया। हाईकोर्ट के पूर्व जज श्री जसराज चोपड़ा ने आचार्यश्री का अभिनन्दन करते हुए कहा कि साधु का दर्शन पुण्य प्रदान करने वाला होता है और गुरुदर्शन तो तत्काल फल प्रदान करने वाला है। मैं यहां आचार्यश्री के दर्शन को उपस्थित हुआ, यह मेरा सौभाग्य है। हम सभी सद्भावना के साथ सदाचरण करने का प्रयास करें। श्रीमती शशी बोहरा ने भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल और तेरापंथ समाज ने गीत के माध्यम से आचार्यश्री की अभ्यर्थना की। ज्ञानशाला के बच्चों ने भी भावात्मक प्रस्तुति देकर आचार्यश्री का स्वागत किया। इस दौरान बिहार के पूर्व शिक्षामंत्री और वर्तमान राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष श्री रामचंद्र पूर्व ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती रंजना पूर्वे के साथ आचार्यश्री के दर्शन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 









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