अपने जीवन में संयम के पर्याय को कलंकमुक्त बनाये रखे : आचार्यश्री महाश्रमण

- कुरुवा में मना शांतिदूत का 44वां दीक्षा दिवस -
- तेरापंथ के युवाओं ने इसे देश में युवा दिवस के रूप में किया समायोजित -
- साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यनियोजिकाजी, साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनिश्री ने अर्पित की प्रणति -
- अभातेयुप के पदाधिकारी और सदस्यों ने भी आचार्यश्री की अभिवन्दना, दी भावाभिव्यक्ति -
आचार्यश्री महाश्रमणजी

09.05.2017 कुरुवा, दुमका (झारखंड) (JTN) : झारखंड में अहिंसा यात्रा भले ही कुल दस दिनों की भी न हो, लेकिन ऐतिहासिकता के मामले में झारखंड अन्य प्रदेशों से कम नहीं है और जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के पट्टोत्सव समारोह के बाद मंगलवार को आचार्यश्री के 44वें दीक्षा दिवस के अवसर का भी गवाह बनकर अपने भाग्य पर इठला उठा। झारखंड राज्य के दुमका जिले के कुरुवा स्थित राजकीय मध्य विद्यालय परिसर में आचार्यश्री का 44वां दीक्षा दिवस का समायोजन किया गया। इस दौरान आचार्यश्री ने लोगों को अपने संयम की साधना को कलंकमुक्त रखने की प्रेरणा प्रदान की। वहीं धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यनियोजिकाजी, साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनिश्री ने भी आचार्यश्री के प्रति अपनी भावों की प्रणति अर्पित की। साथ ही इस अवसर को अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद ने आचार्यश्री के दीक्षा दिवस को युवा दिवस के रूप में समायोजित किया। अभातेयुप के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बीसी भलावत, महामंत्री श्री विमल कटारिया आदि पदाधिकारियों और कोलकाता के सदस्य आचार्यश्री के श्रीचरणों में पहुंचकर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 
मानव-मानव के कल्याण के अखंड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी अहिंसा यात्रा के साथ मंगलवार की प्रातः लकड़ापहाड़ी से प्रस्थान किया। लगभग चैदह किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री दुमका जिले के कुरुवा स्थित राजकीय मध्य विद्यालय पहुंचे। 
विद्यालय प्रांगण में आयोजित समारोह में आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों को और उपस्थित लोगों को अपने जीवन में संयम के पर्याय को कलंकमुक्त बनाने की प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई कलंक लग भी जाए तो उसका शोधन करने का प्रयास करना चाहिए। इस अवसर पर आचार्यश्री ने मुख्यनियोजिकाजी और साध्वीवर्याजी को मिले नए दायित्वों में खूब अच्छा कार्य करने की विशेष प्रेरणा प्रदान की। वहीं चतुर्दशी तिथि होने के कारण आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों को मर्यादाओं की याद दिलाई तो समस्त साधु-साध्वियों ने अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण कर अपने संकल्पों को दोहराया। 
इसके उपरान्त साध्वीप्रमुखाजी ने आचार्यश्री की अभिवंदना करते हुए कहा कि बैशाख महीने का शुक्लपक्ष आचार्यश्री के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। आचार्यश्री के जीवन का हर महत्वपूर्ण कार्य बैशाख मास के शुक्लपक्ष में होता है, इसलिए आचार्यश्री के कार्यों में भी शुक्लता दृष्टिगोचर होती है। आप अपने संकल्पों से कभी विचलित नहीं होते। युवा पीढ़ी आचार्यश्री से प्रेरणा प्राप्त कर संघ और समाज को अच्छा बनाने का प्रयास कर सकते हैं। इसके उपरान्त मुख्यनियोजिकाजी, साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनिश्री ने भी आचार्यश्री के महिमा का गुणगान किया। अभातेयुप के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बीसी भलावत और महामंत्री श्री विमल काटारिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। वहीं तेयुप कोलकाता के सदस्यों ने गीत के माध्यम से आचार्यश्री की अभिवन्दना की और आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। अभातेयुप के अध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि योगेशकुमारजी ने आचार्यश्री की अभ्यर्थना में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। अंत में आचार्यश्री मंे परम पूज्य गुरुदेव तुलसी के प्रति श्रद्धा प्रणति अर्पित की और शासनस्तंभ मंत्री मुनिश्री सुमेरमलजी ‘लाडनूं’ के प्रति अपनी कायिक और मानसिक प्रणति अर्पित की। 












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