सर्वकर्मविमुक्ति हो मानव जीवन का लक्ष्य: आचार्य श्री महाश्रमण

02.06.2017 सिंगूर, हुगली (पश्चिम बंगाल)ः मानवता का संदेश देते महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण अपनी धवल सेना के साथ शुक्रवार की सुबह हमिरागाछी स्थित श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति परिसर से मंगल प्रस्थान किया। गुरुवार की रात हुई तेज बरसात के बाद भी आसमान मंे बादल छाए हुए थे, लेकिन हवा न चलने के कारण उमस बरकरार थी। उमस के कारण लोगों का हाल बेहाल था। ऐसी घुटनवाली उमस में भी आचार्यप्रवर ने लगभग ग्यारह किलोमीटर का विहार कर सिंगूर स्थित श्री बड़ाबाजार लोहापट्टी सेवा समिति के परिसर में पहुंचे। इस समिति के पदाधिकारियों ने शांतिदूत का स्वागत किया।
परिसर स्थित खुले हॉल में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने जीवन में सर्वकर्मविमुक्ति का लक्ष्य बनाने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि मनुष्य से श्रेष्ठ कोई प्राणी नहीं। आदमी को अपने जीवन मंे लक्ष्य निर्धारित करने का प्रयास करना चाहिए। लक्ष्यविहीन जीवन किस दिशा में जा सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में लक्ष्य का निर्धारण कर लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में बड़ा लक्ष्य बड़ी सोच और छोटा लक्ष्य छोटी सोच का द्योतक है। आदमी को आस्तिक विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। आदमी को कर्मों से मुक्त होने का लक्ष्य निर्धारित करने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य जीवन का उत्तम लक्ष्य कर्मों की निर्जरा का होना चाहिए। धर्म का मूलभूत साधन मानव जीवन है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में सर्वकर्मविमुक्ति का लक्ष्य निर्धारित करने का प्रयास करना चाहिए। सर्वकर्मविमुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का साधन है साधना। आदमी साधना व तपस्या के माध्यम से अपने कर्मों का निर्जरा करने का प्रयास करना चाहिए और सर्वकर्मविमुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने उपासक-उपासिकाओं को विशेष प्रेरणा प्रदान की। इसके उपरान्त प्रसंगवश आचार्यश्री ने अपने साथ चल रहे बालमुनियों को अपने समक्ष बुलाया तो बालयोगी मुनि प्रिंसकुमारजी, मुनि केशीकुमारजी, मुनि नमनकुमारजी, मुनि पार्श्वकुमारजी और मुनि धु्रवकुमारजी उपस्थित हुए। आचार्यश्री ने सभी को अपना परिचय प्रस्तुत करने को कहा। सभी बालमुनियों ने अपना-अपना परिचय प्रस्तुत किया और फिर आचार्यश्री के निर्देशानुसार दसवेंआलियं के अलग-अलग श्लोेकों का उच्चारण भी किया। आचार्यश्री ने उन्हें प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि अब चतुर्मास का समय निकट आ रहा है। इस समय में खूब सीखना करना है। इस समय का लाभ उठाना है और ज्ञानाराधना में समय नियोजित करने की प्रेरणा दी और मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।  कार्यक्रम के अंत में इस समिति के अध्यक्ष श्री विमल टिबड़ेवाल और श्रीमती रश्मिदेवी सिंघी तथा प्रीति सिंघी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावापूर्ण विनयांजलि अर्पित की। 

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