वाणी संयम जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग: आचार्यश्री महाश्रमण

- पर्युषण महापर्व का चतुर्थ दिवस ‘वाणी संयम दिवस’ के रूप में आयोजित -
- आचार्यश्री ने लोगों को परिमित भाषी बनने की दी प्रेरणा -
- ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ में आचार्यश्री मरिचिकुमार के गर्व भाव का किया वर्णन -
- दस श्रमण धर्मों पर मुख्यमुनिश्री और साध्वीवर्याजी ने श्रद्धालुओं को मिली प्रेरणाएं -

22 अगस्त 2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : कोलकाता के राजरहाट स्थित ‘महाश्रमण विहार’ में वर्ष 2017 का चतुर्मास परिसंपन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखंड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में भी पर्युषण महापर्व की भव्य आराधना हो रही है। श्रद्धालु अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में अपनी पर्वाराधना को विशेष बना रहे हैं।
मंगलवार को पर्युषण महापर्व का चतुर्थ दिवस ‘वाणी संयम दिवस’ के रूप में समायोजित हुआ। अध्यात्म समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने वाणी सयंम दिवस पर अपनी मंगलवाणी से पावन संदेश प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में शास्त्र के अनुसार चार प्रकार की भाषा प्रज्ञप्त है-सत्य, मृषा, सत्य-मृषा और असत्य-अमृषा। आदमी के बोलने में इन चार प्रकार की भाषाओं का प्रयोग होता है। 
आचार्यश्री ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया मंे भाषा की सच्चाई बहुत ऊंची बात होती है। भाषा की सच्चाई के भाव शुद्धि आवश्यक होती है। भाव ही भाषा को सत्य या असत्य बनाने वाला होता है। भाव शुद्ध हो तो भाषा सत्य और भाव अशुद्ध हो तो भाषा असत्य हो सकती है। सत्य भाषा के लिए आदमी के भीतर ऋजुता अर्थात् सरलता हो तो सच्चाई का एक आयाम पूर्ण मानना चाहिए। सत्य के लिए आदमी को मितभाषी भी होना आवश्यक है। सच्चाई के लिए साहस की भी आवश्यकता होती है। वे लोग धन्य होते हैं जो सत्य बोलने का साहस रखते हैं। यदि सत्य बोलने का साहस न हो तो आदमी को मौन रह जाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने वाणी रत्न के समाने बताते हुए कहा कि मुख इस कोट है और होंठ इसके दरवाजे हैं। आदमी को सोच-सोचकर बोलने का प्रयास करना चाहिए। 
आचार्यश्री ने मृषा भाषा के बारे में बताते हुए कहा कि जो है ही नहीं, वैसा बोलना मृषा भाषा है। आदमी चार कारणों से झूठ बोल सकता है। गुस्से में, लोभ वश, भय से और हंसी-मजाक में आदमी झूठ बोल सकता है। आदमी को यथासंभव झूठ से बचने का प्रयास करना चाहिए। थोड़ा सत्य और थोड़ा झूठ मिश्रा भाषा हो जाती है। असत्य-अमृषा भाषा को व्यवहार भाषा भी कहा जाता है। इसमें आदमी किसी से कुछ कहता है, कुछ आदेश देता है, कुछ बताता है, जिसमें सच और झूठ की कोई बात ही नहीं होती है। आदमी को असत्य और मिश्र भाषा से पूरी तरह बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को परिमित भाषी बनने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अपनी वाणी का जितना संयम कर सके, वह उसके लिए श्रेयस्कर हो सकती है। ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ को आचार्यश्री ने गति देते हुए मरिचि कुमार के जीवन में आए गर्व भाव का वर्णन किया। 
साथ ही आचार्यश्री ने अपने प्रवचन के अंत में बालमुनियों सहित सभी साधु-साध्वियों को सेवा के लिए हमेशा तैयार रहने की प्रेरणा प्रदान की। 
दस श्रमण धर्मों में दो धर्म ‘लाघव-सत्य’ पर मुख्यमुनिश्री ने श्रद्धालुओं को अवगति प्रदान की तो साध्वीवर्याजी ने गीत के माध्यम से लोगों को सच्चाई के राह पर चलने को उत्प्रेरित किया। 








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