आध्यात्मिक उल्लासमय माहौल में मना संवत्सरी महापर्व

-महातपस्वी आचार्यश्री ने बताया संवत्सरी महापर्व का महात्म्य
-‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ का आचार्यश्री ने किया मंगल समापन
-दूसरी बार प्रवचन पंडाल में पधार आचार्यश्री ने तेरापंथ के आचार्यों की यशोगाथा का किया वर्णन
-पूरे दिन साधु-साध्वियों ने धर्मोपदेश से श्रद्धालुओं को दिलाया आध्यात्मिक लाभ
-सैंकड़ों तपस्वियों के आचार्यश्री के श्रीमुख से अपनी तपस्या का किया प्रत्याख्यान 

26.08.2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : पर्युषण महापर्व का अंतिम आठवां दिन संवत्सरी महापर्व के रूप में आध्यात्मिक उल्लासमय माहौल में मनाया गया। कोलकाता के राजरहाट में स्थित ‘महाश्रमण विहार’ परिसर में सूर्योदय के होने पूर्व से ही जो श्रद्धालुओं की अपार भीड़ और साधु-साध्वियों की उपासना, उपदेश और तपस्याओं के प्रत्याख्यान के द्वारा जो आध्यात्मिक वातावरण बना वह पूरे दिन बना रहा। मानों आकाश का सूर्य लोगों का लौकिक पथ प्रशस्त कर रहा था तो धरती का महासूर्य अपनी आध्यात्मिक पथ पर उन्हें अग्रसर होने की प्रेरणा के साथ उनके मोक्ष पथ को प्रशस्त कर रहा था। ऐसे नव्य-भव्य माहौल में संवत्सरी महापर्व का शुभारम्भ हुआ। 
संवत्सरी महापर्व होने के कारण शनिवार को सूर्योदय से पूर्व ही पूरा ‘महाश्रमण विहार’ श्रद्धालुओं से पट चुका था। मानों प्रत्येक तेरापंथी संवत्सरी महापर्व का उपवास करने को आतुर दिखाई दे रहा था। लोगों का उत्साह देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानों सभी के ऊपर महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की ऐसी कृपा बरस रही हो कि सभी बिना अन्न-जल के चौबीस घंटे व्यतीत करने को आतुर दिखाई दे रहे थे। आज प्रवचन कार्यक्रम सात बजे ही आरम्भ हो गया था। विभिन्न साधु-साध्वियों द्वारा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किए जा रहे थे। इस दौरान आचार्यश्री के आगमन से पूर्व मुख्यनियोजिकाजी ने भी अपने प्रेरक वक्तव्यों से श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान की। 
आचार्यश्री लगभग दस बजे प्रवचन पंडाल में पहुंचे तो पूरा वातावरण ‘वंदे गुरुवरम’ से गूंज उठा। आचार्यश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने श्रीमुख से आध्यात्मिक अमृतपान कराते हुए कहा कि आगम वाङ्मय में धर्म को उत्कृष्ट मंगल कहा गया है। अहिंसा, संयम और तप उत्कृष्ट धर्म हैं और जिस आदमी का मन सदैव धर्म में रमा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। संवत्सरी महापर्व का यह दिन धर्म का दिन है। आज के दिन वर्ष के पापों की शुद्धि करने का दिन होता है। आचार्यश्री ने आठ दिवसीय इस महापर्व के आयोजना के पौराणिक महत्त्व का विस्तृत वर्णन किया। आचार्यश्री ने इसे पर्वाधिराज बताते हुए कहा कि यह आत्मा के कल्याण से जुड़ा हुआ है। यह चतुर्मास की स्थापना का अंतिम दिन भी होता है। 
आचार्यश्री ने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा को आज पूर्ण करते हुए भगवान महावीर के जन्म से लेकर निर्वाण तक की संपूर्ण कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक लाभ प्रदान किया। इसके उपरान्त मुख्यमुनिश्री ने संवत्सरी के ऐतिहासिक महत्त्व के बारे में श्रद्धालुओं को बताया तो साध्वीवर्याजी ने ‘आत्मा की पोथी’ गीत का संगान कर श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री एकबार प्रवास स्थल की ओर पधार गए, किन्तु साधु-साध्वियों द्वारा विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर श्रद्धालुओं को प्रदान किया जाता रहा। 
लगभग सवा तीन बजे के आसपास एकबार पुनः आचार्यश्री प्रवचन पंडाल में उपस्थित हुए। आचार्यश्री ने अपने आगमन के साथ ही तेरापंथ धर्मसंघ के शुभारम्भ व इस धर्म के प्रवर्तक आचार्यश्री भिक्षु के सहित पूर्व के दस आचार्यों के जीवनकाल, उनके द्वारा धर्मसंघ को दिए गए विशेष अवदानों, मानवता के कल्याण के लिए दिखाए गए रास्तों का वर्णन किया। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त भी साधु-साध्वियों द्वारा व्रती श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक खुराक देर शाम तक प्रदान की जाती रही। 








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