संस्कार निर्माण की आधार शिला है ज्ञानशाला : बीड

आचार्य महाश्रमण के सुशिष्य मुनि जिनेशकुमार जी के सानिध्य में तेरापंथ सभा, बीड के तत्वावधान में शेष महाराष्ट्र ज्ञानशाला प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन महाश्रमण सभागार में हुआ। जिस में औरंगाबाद, सोलापुर, लातुर, शाहदा, साक्री आदि क्षेत्रों से प्रशिक्षिकाएं उपस्थित हुए। मुख्य प्रशिक्षक प्राध्यापक उपासक निर्मल जी नवलखा थे। इस अवसर पर मुनि जिनेशकुमार ने कहा पूरा संसार दुःख की भट्टी में जल रहा है। उस से निजात पाने का एक माञ उपाय है धर्म। धर्म साधना के चार अंग है। सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चरित्र, सम्यक् तप। धर्म साधना में सम्यक् ज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं। ज्ञान आत्मा का निजी गुण हैं। ज्ञान आत्मा की अमूल्य निधि हैं। ज्ञान से व्यक्ति स्वयं धर्म में स्थित होता है दूसरों को धर्म में स्थित करता है। ज्ञान से एकाग्रता, विवेक, संयम, इन्द्रिय निग्रह का विकास होता है। ज्ञानावरणीय कर्म जितना हल्का होता है उतना ही व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान के विकास में विनम्रता, सहिष्णुता, जागरुकता, स्वस्थता, श्रमशीलता आदि तत्व विशेष महत्व रखते हैं। शिक्षकों को श्रही, सम्यक् पुरुषार्थ, अर्थबोध सम्यक् उच्चारण, द्रव्य क्षेञ कालभाव का ज्ञाता होना जरूरी है। मुनि जिनेशकुमार ने कहा संस्कार निर्माण की आधार शिला ज्ञानशाला है। ज्ञानशाला संस्कार शाला, चरित्र शाला बने। हम गुरूदेव तुलसी के आभारी है। जिन्होंने युग की नब्ज को देखकर भावी पीढ़ी को सुसंस्कारी बनाने के लिए ज्ञानशाला का उपक्रम दिया।  ज्ञानशाला में पढने वाली प्रशिक्षकाएं चरिञवान, विनम्र, ज्ञानी, उध्दार , समझदार निस्वार्थी बने और आपस में सामंजस्य बना रहे। उपासक निर्मल जी नवलखा ने कहा- आचार्य तुलसी की सान्निध्य में ज्ञानशाला का सुंदर ढंग से उपक्रम प्रारंभ हुआ। ज्ञानशाला विनम्र शाला है। प्रशिक्षक स्वयं ज्ञान वृध्दि करे और दूसरों की ज्ञान वृध्दि में सहयोगी बने। कार्यक्रम का शुभारंभ तेरापंथ महिला मंडल के मंगल गीत से हुआ। स्वागत भाषण तेरापंथ सभा की ओर से रोशन समदरिया, तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्षा राखी समदरिया शेष महाराष्ट्र ज्ञानशाला की आंचलिक संयोजिका माया मुथ्था, पुष्पाबाई शाह ने अपने विचार रखे। मुनि परमानंद ने कुशल संचालन किया। 

शिक्षण सञ में मुनि जिनेशकुमार ने कहा बालक घर परिवार समाज का भविष्य है। बालक के निर्वाण में माता-पिता, गुरूजनों अभिभावकों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। ज्ञानशाला ज्ञान वृध्दि का कारक है। प्रशिक्षक बालक-बालिकाओं को धार्मिक संस्कार व्यवहारिक संस्कार भी दे। तथा स्वयं अनुशासन संयम का विकास करे और अपने दायित्व का निष्ठा के साथ निर्वहन करे। प्रशिक्षक निर्मल नवलखा ने कहा-अपने आपको हीन दीन न माने और संगठन के प्रति आस्था रखे, अनुशासन का विकास व स्वार्थ भाव न रखते हुए बच्चों की एकाग्रता व संकल्प शक्ति का विकास कैसे हो और क्रोध को कैसे नियंत्रित करे उसके उपाय बताए। शहादा से लड्डा, औरंगाबाद से रंजना दुग्गड, लातूर से किशोरजी गटागट, सोलापुर से रूपा सुराणा व स्वाति चौरडिया साक्रि से जोशिला पगारिया और बीड से आंचल समदरिया आदि की जिज्ञासाओं का समाधान मुख्य रूप से निर्मल नवलखा ने दिये। आभार सविता मरलेचा ने किया।

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