खोती मानवता को जागृत करने आते हैं आचार्यश्री महाश्रमण जैसे महापुरुष: महामहिम राज्यपाल

अहिंसा काॅन्क्लेव: अनुगुंजित हुए अहिंसा, सद्भावना व नशामुक्ति के संदेश
-अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी का झारखण्ड सरकार ने अपने राज्य में किया अभिनन्दन
-‘झारखंड की विकास में अहिंसा, सद्भावना और नशामुक्ति के भूमिका’ थीम पर आयोजित हुआ कार्यक्रम
-अहिंसा, सद्भावना व नशामुक्ति से झारखंड ही नहीं किसी भी खंड का हो सकता है विकास: आचार्यश्री महाश्रमण



02.12.2017 मधुवन, सम्मेद शिखर, गिरीडीह (झारखंड)ः सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति जैसी जन कल्याणकारी सूत्रों के साथ अहिंसा यात्रा लेकर निकले अहिंसा यात्रा प्रणेता जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के झारखंड राज्य की यात्रा के संदर्भ में शनिवार को बीस तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि के नाम से प्रख्यात सम्मेद शिखरजी स्थित मधुबन में झारखण्ड सरकार ने ‘झारखण्ड निर्माण में अहिंसा, सद्भावना व नशामुक्ति की भूमिका’ थीम पर आधारित अहिंसा काॅन्क्लेव का आयोजन किया। यह समारोह स्वयं अहिंसा यात्रा के प्रणेता की मंगल सन्निधि में झारखण्ड राज्य की प्रथम महिला राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू सहित झारखंड सरकार के पर्यटन, खेलकूद व संस्कृति मंत्री श्री अमर बावरी सहित अन्य राजनैतिक और प्रशासनिक गणमान्यों की उपस्थिति में समायोजित हुआ।
   अहिंसा यात्रा प्रणेता से प्रेरणा प्राप्त करने समय से कुछ पहले ही पहुंच गई राज्यपाल महोदया
Sammed Shikhar ji, Jharkhand : Governer of Jharkhand reached to Sammed Shikhar ji to take blessings from Aacharya Mahashraman Ji



अहिंसा काॅन्क्लेव का शुभारम्भ प्रातः दस बजे से होना था। निर्धारित समय से लगभग दस मिनट पूर्व अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ मधुबन थाने के समीप बने आयोजन स्थल पर पहुंचे। उसके कुछ समय पश्चात ही निर्धारित समय से लगभग दस मिनट पूर्व ही झारखंड राज्य की प्रथम महिला राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू भी उपस्थित हो गईं। आचार्यश्री को अपनी प्रणति अर्पित कर मंचासीन हुईं। राज्यपाल की समय से पूर्व उपस्थिति देख सहसा ही लोगों ने कहा कि काश ऐसे समय सीमा के प्रति निष्ठा देश के नेताओं में भी होती। शायद यह आचार्यश्री की पावन प्रेरणा का ही प्रतिफल था जो राज्यपाल महोदया समय से पूर्व ही कार्यक्रम मंे उपस्थित हो गईं।
राष्ट्रगान और नमस्कार महामंत्रोच्चार से हुआ समारोह का शुभारम्भ
निर्धारित समयानुसार दस बजे भारतीय संविधानानुसार राज्यपाल की उपस्थिति में सर्वप्रथम राष्ट्रगान का संगान हुआ उसके उपरान्त आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मुखारविन्द से नमस्कार महांत्र का मंगल उच्चारण हुआ। इसके साथ इस भव्य समारोह का शुभारम्भ हो गया।
पर्यटन मंत्री, विधायकद्वय और उपायुक्त ने किया अभिनन्दन
समारोह का शुभारम्भ हुआ तो सर्वप्रथम झारखंड राज्य सरकार की ओर से सर्वप्रथम उपायुक्त श्री उमाशंकर सिंह ने आचार्यश्री का राज्य सरकार द्वारा अभिनन्दन करते हुए कहा कि आप एक उच्च कोटि के साधक हैं। आपके शांत चित्त, प्रसन्न मुखाकृति से मानों थकान स्वतः ही मिट जाती है। आपकी गंभीर प्रवचनशैली श्रोताओं के हृदय पर गहरी छाप छोड़ने वाली होती है। आप जैसे महातपस्वी के स्वागत का अवसर प्राप्त कर हम सभी स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
गिरीडीह की स्थानीय विधायक श्री निर्भय सिंह शेखावादी ने अपने विधानसभा क्षेत्र में आचार्यश्री का अभिवादन करते हुए कहा कि यह पावन भूमि आपके आगमन से जागृत हो उठी है। हम आपका अपनी धरती पर हृदय से स्वागत करता हूं।
जमुआ विधायक श्री केदार हाजरा ने भी आचर्यश्री का झारखंड की धरा पर अभिनन्दन करते हुए कहा कि परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी महाराज के चरणों की हम वन्दना करते हैं।
इसके उपरान्त पर्यटन, खेलकूद व संस्कृति मंत्री श्री अमर बावरी ने भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि मैंने महासंत आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों के दर्शन झारखंड में प्रवेश के दिन ही किए थे। उसके बाद से मुझे श्रीचरणों में पहुंचने की हमेशा ललक सी जगी रहती है। आचार्यश्री जिन सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के संदेश लेकर चल रहे हैं, उनकी आवश्यकता वर्तमान में केवल झारखंड को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को है। आचार्यश्री हम आपके प्रति कृतज्ञ हैं जो आपने हमारे आग्रह को मानते हुए हमें इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करने की सहमति प्रदान की। आपके विचारों को हम अपने जीवन में उतारने के साथ ही राज्य सरकार के कार्यों में लाने की प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए आपका मार्गदर्शन हम सभी के लाभदायी सिद्ध होगा। आपके अभिनन्दन के लिए हमने इस स्थल का चुनाव इसलिए किया कि यह पर्यटन की दृष्टि से और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। इस दिव्य भूमि से आपश्री के मुख से निकलने वाले संदेश झारखंड को आलोकित करने में समर्थ होंगे। साथ ही अहिंसा यात्रा प्रवक्ता मुनिश्री कुमारश्रमणजी ने भी लोगों को थीम के विषय में अवगति प्रदान की।
आचार्यश्री की प्रेरणा लोगों का भावात्मक विकास करने में सक्षम: साध्वीप्रमुखा
तेरापंथ धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि बीस तीर्थंकरों की इस निर्वाण भूमि का वाइव्रेशन ही विशेष है। झारखंड एक नया राज्य है और नए के निर्माण में प्रारम्भ में ही ध्यान दिया जाए तो उसे बेहतर बनाया जा सकता है। यहां शिक्षा के साथ आध्यात्मिक चेतना का विकास की अपेक्षा है। आचार्यप्रवर की यह यात्रा ऐसे राज्यों की बहुत ही लाभदायी है। आचार्यश्री की प्रेरणा से लोगों की चेतना में अहिंसा का विकास हो, लोगों के भाव उन्नत बनें ताकि उनका भावात्मक विकास होगा तो विकासोन्मुख बन सकते हैं।
अहिंसा यात्रा प्रणेता के श्रीमुख से प्रस्फुटित हुए अहिंसा, सद्भावना व नशामुक्ति के संदेश
अखंड परिव्राजक, दृढ़ संकल्पशक्ति के धनी महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ‘अहिंसा काॅन्क्लेव’ में अपना पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में कोई भी प्राणी वध्य नहीं है। अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। तीन वर्ष से अधिक समय से विभिन्न देशों और राज्यों की यात्रा कर झारखंड के सम्मेद शिखर जी में पहुंचे हैं। एक तीर्थंकर भूमि भी तो वह महत्त्वपूर्ण हो जाती है और इस क्षेत्र से 20 तीर्थंकरों सिद्धत्व को प्राप्त हुए हैं।
अहिंसा अमृत के समान है तो हिंसा विष के समान है। जहां अहिंसा हो, वहां विकास का मार्ग प्रशस्त होता है तथा जहां हिंसा हो वहां ह्रास होता है। अहिंसा की भावना लोगों के भावों में होनी चाहिए। जो प्राणी दूसरों को दुःख देता है या देने का प्रयास करता है, मानों वह स्वयं के लिए दुःख तैयार कर लेता है। स्वयं सुखी बनने के लिए आदमी को दूसरों को सुखी बनाने अथवा दूसरों को चित्त समाधि व शांति प्रदान करने प्रयास करना चाहिए। जो व्यवहार आदमी स्वयं के लिए नहीं चाहता है, वैसा व्यवहार उसे दूसरों के लिए नहीं करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को छोटे-छोटे प्राणियों के प्रति भी मंगल मैत्री की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए ताकि उनसे उनकी भी हिंसा न होने पाए।
आचार्यश्री ने पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी-आदमी के प्रति अहिंसा का भाव रखे और मैत्री भाव के साथ रहे तो झारखंड हीं क्या, कोई भी खंड अच्छा हो सकता है। सबके प्रति सद्भावना हो। किसी के प्रति भी राग-द्वेष की भावना नहीं, बल्कि मंगल मैत्री, सौहार्द की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने नशामुक्ति के लिए लोगों को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि नशा नाश का द्वार है और नशा करने वाले की दुर्दशा करने वाला हो सकता है। आदमी पहले नशा करता है बाद में नशा उसको करने लग जाता है। आदमी को ऐसे पदार्थों का त्याग करने का प्रयास करना चाहिए। झारखंड की जनता में भी नशा जितना कम हो सकेगा, विकास की दिशा उतनी अच्छी हो सकती है। आचार्यश्री ने अशिक्षा को दूर करने और शिक्षा में बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक और भावात्मक विकास करने का प्रयास करना चाहिए। जहां के बच्चे संस्कारित हो जाएं, मानों वहां का भविष्य अच्छा बन सकता है। अहिंसा, सद्भावना और नशामुक्ति की चेतना लोगों में जागृत हो जाए तो झारखंड का और बेहतर विकास हो सकता है।
और उपस्थित हो गया अद्भुत नजारा, अपलक निहारते रहे लोग
शनिवार को चतुर्दशी तिथि होने के कारण जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की साधु परंपरा के अनुसार हाजरी का क्रम रहता है। आचार्यश्री की सन्निधि में उपस्थित समस्त चारित्रात्माएं अपने साधुत्व के संकल्पों के साथ अपने निष्ठा के संकल्पों को परिपुष्ट बनाने के लिए उनका पुनरावर्तन करते हैं। इस कारण आचार्यश्री की सन्निधि में उपस्थित समस्त साधु, साध्वियों और समणीवृंद ने आचार्यश्री के एक आह्वान पर अपने स्थान पर खड़े होकर समवेत स्वर में लेख पत्र का उच्चारण आरम्भ किया तो इस समारोह में एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न हो गया। सुरक्षा में लगे सैंकड़ों सुरक्षा कर्मी, प्रशासनिक अधिकारी, सहित मंचस्थ गणमान्य सहित कार्यक्रम में सहभागी अन्य अजैन लोग भी इस दृश्य को अपलक निहारते रहे।
खोती मानवता को जागृत करने आते हैं आचार्यश्री महाश्रमण जैसे महापुरुष: महामहिम राज्यपाल
समारोह की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित झारखंड राज्य की प्रथम महिला राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने अपने भावपूर्ण हृदयोद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि इस पवित्र भूमि में मैं आज आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में उनके पवित्र, पावन, मंगल और कल्याणकारी प्रवचन को सुनने के लिए आई हूं। आज के कार्यक्रम के जो बिन्दु हैं (अहिंसा, सद्भावना, नशामुक्ति) वह मानव जीवन का आधार है। आज का मानव समाज न जाने कहां से कहां पहुंच गया है। आधुनिक मानव को यह धरती छोटी लगने लगी है। मानव अपनी मानवता खो रहा है। इसलिए आचार्यश्री महाश्रमणजी जैसे महापुरुष इस धरती पर आते हैं और हम सभी के भीतर से खोती मानवता को जागृत करने की प्रेरणा प्रदान कर जाते हैं और हमें हमारी भीतर की मानवता की याद दिला जाते हैं। आज आचार्यश्री को इन संकल्प सूत्रों को लेकर देश, विदेश और राज्य-राज्य, गांव-गांव, नगर-नगर घूमने की आवश्यकता क्यों पड़ी, क्योंकि आदमी के भीतर से इंसानियत, मानवता समाप्त हो रही है। नशाखोरी बढ़ रही है। खोई सद्भावना को पुनः जागृत करने, मानवता को स्थापित करने और नशामुक्त जीवन जीने की प्रेरणा देने के लिए आचार्यश्री की इस महान पदयात्रा का मैं जितना भी साधुवाद करूं, वह कम होगा।
हमनें जो आचार्यश्री की वाणी को सुना। उसके केवल सुनकर भूला नहीं देना है, बल्कि उसे अपने भीतर उतारना है, उसे दूसरों तक भी पहुंचाने का प्रयास करना है। झारखंड भले नया राज्य हो किन्तु यह भूमि काफी प्राचीन और पावन है। आचार्यश्री की बातों को अपने जीवन में उतारना होगा, दूसरों को बताना होगा तभी वास्तविक विकास हो सकेगा।
इसके उपरान्त आचार्यश्री ने राज्यपाल महोदया को पावन आशीर्वाद प्रदान किया। झारखंड राज्य और यहां की जनता के प्रति मंगलकामना की। राज्यपाल महोदया को जैन विश्व भारती की ओर से दो ग्रंथ भी भेंट किए गए। नेपाल-बिहार तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री अभयजी पटावरी द्वारा सबका धन्यवाद ज्ञापित किया गया। इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी गणमान्यों को साहित्य प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अंत में आचार्यश्री से राज्यपाल महोदया ने व्यक्तिगत वार्तालाप कर पावन पाथेय प्राप्त किया। आचार्यश्री ने उन्हें पावन पाथेय और आशीर्वाद प्रदान किया।


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