तपस्या साधु का धन होता है - आचार्य श्री महाश्रमण जी

‘महाश्रमण समवसरण’ से महाश्रमण की वाणी सुन निहाल हुए केसिंगावासी
-चतुर्विध धर्मसंघ को महातपस्वी ने दी मंगल प्रेरणा, तपस्या को किया व्याख्यायित 

आचार्य श्री महाश्रमण जी के सान्निध्य में बालमुनी वृन्द - हाजरी वाचन के अवसर पर 


16.03.2018 केसिंगा, कालाहांडी (ओड़िशा) :  जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना संग वर्तमान में पश्चिम ओड़िशा के कालाहांडी जिले के केसिंगा में त्रिदिवसीय प्रवास कर रहे हैं। इस मंगल प्रवास को प्राप्त कर केसिंगावासी आनंदित हैं, आह्लादित और हर्षविभोर हैं, क्योंकि उन्हें अपने इस जीवन में वह अमूल्य खजाना प्राप्त हो गया है जो आने वाले वर्षों-वर्षों तक शायद ही प्राप्त हो सके। इसलिए सौभाग्य से प्राप्त इस खजाने को संजोने के लिए दोनों हाथों से बटोरने में लगे हुए हैं। 

शुक्रवार को तेरापंथ भवन के समीप ही बने ‘महाश्रमण समवसरण’ के भव्य पंडाल में प्रवचन श्रवण को उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री के पदार्पण से पूर्व मुख्यनियोजिकाजी तथा साध्वीप्रमुखाजी द्वारा श्रद्धालुओं को मंगल उद्बोधन प्राप्त हुआ। उसके उपरान्त आचार्यश्री का मंगल पदार्पण हुआ तो आचार्यश्री के पट्ट के एक ओर साधु समुदाय तो दूसरी ओ साध्वीवृंद और समणीवृंद उपस्थित होते चले गए। यह अवसर था चतुर्दशी का जिस दिन आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में हाजारी का क्रम रहता है। इसलिए गुरुकुलवास में रहने वाले साधु-साध्वियों और समणियां भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित हो रहे थे। इन धवल रश्मियों के बीच एक महासूर्य के समान आचार्यश्री पट्ट पर उदियमान बन रहे थे। यह दृश्य देख केसिंगावासी निहाल हो रहे थे। 

साध्वीवर्याजी ने अपने उद्बोधन में लोगों को धर्मयुक्त जीवन जीने को उत्प्रेरित किया। इसके उपरान्त आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी मंगलवाणी से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में तप का बहुत महत्त्व होता है। चार समाधियों में एक समाधि तपस्या को भी बताया गया है। तपस्या से समाधि, समाधान प्राप्त होता है। तपस्या से सघन कर्मों के बंध को भी काटा जा सकता है। तपस्या आदमी को संवर और निर्जरा की भी प्राप्ति हो सकती है। तपस्या में उपवास का अपना महत्त्व है। उपवास के दौरान गोचरी लेने जाने और आने का समय बचता है, खाने का समय बच जाता है, जिसका साधु समुचित उपयोग कर सकता है। उपवास के विभिन्न गुणांे का आचार्यश्री ने वर्णन करते हुए कहा कि तपस्या साधु का धन होता है। साधु को तपस्या के माध्यम से मोक्ष की दिशा में प्रगति करने का प्रयास करना चाहिए। 

आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त बालमुनियों और बालसाध्वियों को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए उन्हें अपने स्वाध्याय में विकास करने, विनम्रता में विकास करने और अपने आचार में विकास करने की पावन प्रेरणा प्रदान करने के उपरान्त आचार्यश्री ने हाजरी पत्र का वाचन किया। मुख्यमुनिश्री व आचार्यश्री ने समवेत सुरों में मधुर संगीत का गायन किया तो उपस्थित श्रद्धालुअ भावविभोर हो उठे। 

¬तत्पश्चात् उससे संबंधित साधु-साध्वियों और समणियों के जिज्ञासाओं को क्रम रहा। जिसमें साध्वी विशालयशाजी, साध्वी स्वस्तिकप्रभा, साध्वी आरोग्यश्रीजी, बालयोगी मुनि प्रिंसकुमारजी तथा मुनि हेमराजजी के जिज्ञासाओं को आचार्यश्री ने समाहित किया। मुनि केशीकुमारजी तथा साध्वी आदित्यप्रभाजी, साध्वी कमनीयप्रभाजी व साध्वी  विशालयशा ने लेखपत्र का उच्चारण किया। 

केसिंगा तेरापंथी सभा के पूर्व अध्यक्ष श्री रामनिवास जैन ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानाशाला के बच्चों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति के माध्यम से अपने आराध्य की अभ्यर्थना की। स्थानकवासी समाज की ओर से श्री बसंतलाल जैन ने गीत का संगान कर आचार्यश्री के चरणों में अपनी प्रणति अर्पित की। दिगम्बर जैन समाज की ओर से विकास जैन ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपने भावों को अभिव्यक्त कर आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 



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