पाप कार्यों और बुराइयों से बचने का प्रयास करना चाहिए : आचार्य श्री महाश्रमण

01.04.2018 केरड़ा, रायगढ़ा (ओड़िशा), JTN, उत्कल धरा (ओड़िशा) की धरती को पहली बार अपने चरणरज से पावन बनाने बनाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, मानवता के मसीहा, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ लोगों को मानवता का संदेश देते हुए लगभग तीन महीने से ज्यादा समय से ओड़िशा में आध्यात्मिक ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं। इस गंगा में केवल शहरी ही नहीं, ग्रामीण और वनवासी जनता ने भी डुबकी लगाई है और अपने जीवन को अच्छा बनाने धर्म के मार्ग पर चलने को उत्प्रेरित हुए हैं। इस यात्रा के दौरान अब तक आचार्यश्री ने ओड़िशा राज्य के बारह जिलों की यात्रा कर ग्रामीण और जंगलों के बीच में रहने वाले आदिवासी लोगों को भी सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की पावन प्रेरणा से अच्छादित किया है। 
रविवार को उत्कल धरा पर अहिंसा यात्रा के निर्धारित यात्रा पथ के अनुसार अंतिम विहार करते हुए लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तय कर आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी अहिंसा यात्रा के साथ ओड़िशा राज्य के रायगढ़ा जिले के केरड़ा में पधारे। यहां स्थित सरकारी हाइस्कूल में आचार्यश्री का पावन प्रवास हुआ। 
विद्यालय परिसर में ही उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में दो विचारधारा के लोग मिलते हैं। कुछ लोग नास्तिक विचारधारा के होते हैं। छह दर्शनों में एक नास्तिक दर्शन भी है। चारवाक् दर्शन को नास्तिक दर्शन कहा गया है। इसके अनुसार आगे और पीछे की कोई बात नहीं होती, जो वर्तमान में जीवन है वहीं पहला और अंतिम है। नास्तिक विचारधारा के अनुसार पुनरजन्म को नहीं माना गया है। दुनिया उतनी ही है, जितनी दिखाई देती है। 
आस्तिक विचारधारा पुनरजन्म को मानती है, इसलिए पूर्व जन्म में विश्वास रखती है। यह मानव शरीर नश्वर है, अस्थाई है। आत्मा स्थाई और शाश्वत है। इसलिए आत्मा का अस्तित्व सदैव बना रहता है। इसके ढंग से अब तक आत्मा ने कितने-कितने जन्म ले लिए होंगे और आगे भी लेने वाले होंगे। आत्मा के बार-बार जन्म लेने और बार-बार मृत्यु को प्राप्त होने का कारण है-मान, माया, लोभ और गुस्सा रूपी कषाय। जिनके माध्यम से आत्मा के साथ सघन कर्मों के बंध छिपक जाते हैं। इसलिए आदमी अपने कृत कर्मों के आधार पर जन्म लेता है और अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसका जैसा कर्म होता है, उसको वैसा परिणाम भी भुगतना होता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। अच्छा कार्य करने से आदमी का यह जीवन भी अच्छा हो सकता है और आगे का जीवन भी सुन्दर बन सकता है। 
आचार्यश्री ने इस संदर्भ में कहानी के माध्यम से लोगों को उत्प्रेरित करते हुए कहा कि आदमी को बुराइयों से हमेशा बचने का प्रयास करना चाहिए। यदि आदमी बुरा नहीं करेगा, उसका जीवन अच्छा होगा तो वर्तमान जीवन भी अच्छा हो सकता है और आगे वाली दुर्गतियों से भी बच सकता है। इस प्रकार आदमी को आस्तिक विचारधारा का होने का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आस्तिकता आदमी को आध्यात्मिकता में रहने का प्रयास है। आदमी को इस प्रकार अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए तथा पाप कार्यों और बुराइयों से बचने का प्रयास करना चाहिए। 

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