ज्ञान से जीवन पथ प्रशस्त होता है : आचार्यश्री महाश्रमण


27.05.2018 गुडावल्ली, कृष्णा (आंध्रप्रदेश), JTN, भारत के दिल दिल्ली से सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति रूपी त्रिवेणी द्वारा जनमानस को पावन बनाने के लिए उत्तर-पूर्व, पूर्व, पूर्वोत्तर व मध्य भारत को अपनी मंगलवाणी से अभिसिंचित कर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अब दक्षिण भारत की धरा को अपनी मंगलवाणी से अभिसिंचन प्रदान कर रहे हैं। दक्षिण के प्रथम राज्य के रूप में आचार्यश्री के मंगलवाणी, मंगल चरणरज और मंगल प्रवास से मंगलमय बन रहा आंध्रप्रदेश का कण-कण में मानों आध्यात्मिकता का संचार हो रहा है।
रविवार को अपनी धवल सेना के साथ शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी चिन्ना आउट पल्ली स्थित पिन्नामनेनी सिद्धार्थ इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंस एण्ड रिसर्च फाउण्डेशन परिसर से अगले गंतव्य की ओर प्रस्थान किया तो आचार्यश्री के प्रस्थान के करने से पूर्व ही विभिन्न नगरों में प्रवासित श्रद्धालु आचार्यश्री की पावन सन्निधि में उपस्थित हो चुके थे। आचार्यश्री के विहार के साथ ही श्रद्धालुओं का समूह भी चल पड़ा। रविवार होने के कारण श्रद्धालुओं की उपस्थिति और फिर सजे-धजे राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या सोलह से गुजरती श्वेत सेना को जो भी देखता निहारता ही रह जाता। स्थानीय लोगों को जब किसी भी माध्यम से आचार्यश्री व अहिंसा यात्रा के विषय में अवगति प्राप्त होती तो आचार्यश्री के समक्ष प्रणत हो रहे थे। आचार्यश्री भी उन लोगों को पर आशीषवृष्टि करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। आंध्रप्रदेश के नई राजधानी अमरावती के विकास के लिए चुने गए इस क्षेत्र से गुजरने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या सोलह मानों किसी उद्यान के कम नहीं लग रहा था। मार्ग के दोनों ओर के साथ ही बीच में बने डिवाइडर लगे फूलों और हरे-भरे पौधों से लहलहा रहा था। यह दृश्य किसी भी प्रकृति प्रेमी को आकर्षित करने वाला था।


इस राजमार्ग से होते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी गुडावल्ली स्थित डाॅ. के.के.आर. गौतम इंटरनेशनल स्कूल परिसर में पधारे। स्कूल परिसर में सैंकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी जीवन में ज्ञान के विकास का विशेष प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने चक्षु (आंख) की उपमा से उपमित करते हुए कहा कि ज्ञान के बिना मानों जीवन अंधकारमय हो जाता है। जिसके कारण आदमी अपने भले और बुरे की पहचान भी नहीं कर पाता। अपना ज्ञान अपना होता है और पराया ज्ञान पराया। इसलिए आदमी को अपने जीवन में ज्ञान के विकास का निरंतर प्रयास करना चाहिए। ज्ञान से जीवन पथ प्रशस्त होता है। सम्यक् ज्ञान से सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र की प्राप्ति हो जाए तो आदमी जीवन अच्छा बन सकता है। दुनिया मंे ज्ञान से ज्यादा कोई चीज पवित्र नहीं होती। इसलिए आदमी को अच्छे ज्ञान का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।

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