साधना से शांति मिलती है : महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी

महातपस्वी ने चेन्नई में सृजित किया नवीन स्वर्णिम इतिहास

तीन मुमुक्षु को प्रदान की समणी दीक्षा, प्रवर्धमान हुआ धर्मसंघ

हजारों नयन बने इस भव्य समारोह के साक्षी

18.07.2018 नार्थ टाउन, चेन्नई (तमिलनाडु), JTN, तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम देदीप्यमान महासूर्य, महातपस्वी, शांतिदूत, कीर्तिधार आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को चेन्नई महानगर की उपनगरीय यात्रा के दौरान नार्थ टाउन के बिन्नी गार्डेन में बने भव्य दीक्षा समारोह पंडाल में तीन मुमुक्षुओं को समणी दीक्षा प्रदान कर चेन्नई की धरती से समणी दीक्षा प्रदान करने वाले तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्य बने। इसके साथ ही आचार्यश्री ने तेरापंथ धर्मसंघ व चेन्नई के इतिहास में एक और अमिट आलेख और नए कीर्तिमान का सृजन कर दिया।
अपनी धवल सेना के साथ प्रथम बार दक्षिण को धरा को पावन बना रहे महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को अयनावरम् से मंगल प्रस्थान किया। आचार्यश्री जैसे ही नार्थ टाउन की एरिया में पधारे मानों जनतासमूह का पारावार उमड़ पड़ा। हजारों-हजारों श्रद्धालु बुलंद जयघोष करते हुए अपने आराध्य का स्वागत अभिनन्दन किया। आज तो मानों सड़क मार्ग पर दूर-दूर तक जनता ही दिखाई दे रही थी। कारण था दक्षिण की इस धरा पर कीर्तिधर आचार्य द्वारा एक नया कीर्तिमान, एक नया स्वर्णिम अमिट आलेख लिखा जाना था समणी दीक्षा के रूप में। चेन्नई की इस धरा पर पहली बार तेरापंथ धर्मसंघ के कोई आचार्य समणी दीक्षा प्रदान करने जा रहे थे। इस दृश्य का साक्षी बनने के लिए देश भर से लोग पहुंचे हुए थे। नार्थ टाउन, पेरम्बुर के बिन्नी गार्डेन बना दीक्षा समारोह का विशाल पंडाल जनाकीर्ण बन गया।
समणी दीक्षा समारोह के अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया की साधु परम् सुख को पाने के लिए तुच्छ भोगों को छोड़ते हैं। त्याग का मार्ग अपनाते हैं। त्याग से शांति मिलती है। एक सुविधा होती है और एक शांति होती हैं। सुविधा मकान, कार इत्यादि भौतिक साधनों से मिलती है और शांति साधना एवं त्याग से मिलती हैं। व्यक्ति का जितना जितना जीवन साधनों, इंद्रिय विषयों से विमुख होता है आदमी उतना उतना साधना के मार्ग की ओर आगे बढ़ता रहता है।
आज तीन मुमुक्षु दीक्षार्थी बाईया मानों भौतिक साधनों से दूर होकर साधना के मार्ग की ओर आगे बढ़ने में अभ्युत्थान कर रही हैं।  आचार्य प्रवर ने कहा यह दीक्षा जैन शासन की दीक्षा है। दुनिया में अनेकों धर्मों में से एक धर्म है जैन धर्म और जिसका संबंध वर्तमान में इस अवसर्पिणी काल के पहले तीर्थंकर भगवान ॠषभ से हैं और अंतिम चौबीसवे तीर्थंकर भगवान महावीर हुए। हम जैन शासन की दो परंपराओं श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा में से श्वेतांबर परंपरा को मानने वाले हैं, उसमें भी हम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखने वाले श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ से संबंध रखते हैं। आपने कहा की तेरापंथ धर्मसंघ में गृहत्यागी के लिए दो मार्ग है साधु मार्ग और समण मार्ग। साधु के नियम कठोर होते हैं ,पांच महाव्रतों का पूर्ण रूप से पालन करते हैं। अहिंसा के अनेक विधि विधान नियमों का पालन करते हैं। वायुकाय के जीवों की हिंसा से बचने के लिए मुख पर पट्टी बांधते हैं। रात्रि भोजन नहीं करते। वाहनों का प्रयोग नहीं करते हैं। अपने स्वयं के नाम से मकान, मठ, स्थानक, भवन आदि नहीं रखते।
आचार्य श्री ने समणी दीक्षा के बारे में बताते हुए आगे कहा कि ये भी गृह त्यागी, सन्यासी, घर परिवार को छोड़ने वाले होते हैं। आचार्य प्रवर ने सम्पूर्ण जनमेदनी के सामने दीक्षार्थी बहनों को कसौटी पर कसा। लिखित आज्ञा पत्र प्राप्त होने के बाद भी माता - पिता, परिजनों से मौखिक स्वीकृति लेने के बाद भगवान महावीर, आचार्य भिक्षु एवं उत्तरवर्ती आचार्य को वंदन करते हुए मंगल बेला में मंगल मंत्रोच्चार, आर्षवाणी  के उच्चारण के साथ निर्धारित सावध योग का तीन करण, तीन योग से त्याग कराने के साथ ही तीनों मुमुक्षु बहनों के जीवन का रूपांतर कर दिया।
दीक्षा संस्कार संपन्न कराने के बाद तीनों बहनों को अतीत की आलोचना कराई एवं हर क्रिया में संयमपूर्वक रहने, आचार्य की आज्ञा निर्देशानुसार चलने की प्रेरणा देते हुए अनुशासन का ओज आहार प्रदान किया। दीक्षा के साथ उनका नाम परिवर्तन कर, उनके नामों के भावार्थ अनुरूप जीवन में चलने की महत्वपूर्ण प्रेरणा दी। नवदीक्षित समणीयों ने अपने आराध्य को सविधि वन्दना की।  
आचार्य प्रवर ने मुमुक्षु खुशबू को समणी गम्भीरप्रज्ञा, मुमुक्षु हेतल को समणी हिमांशुप्रज्ञा और मुमुक्षु अंकिता को समणी आलोकप्रज्ञा के नाम से नामकरण करते ही उपस्थित जनमेदनी ने "जय जय ज्योतिचरण, जय जय महाश्रमण" के जयनाद से वातावरण को गुंजायमान कर दिया। आचार्यश्री ने तीनों समणियों को साध्वीवर्याजी के निर्देशन में अपना आध्यात्मिक विकास करने की पावन प्रेरणा प्रदान की। 
मुख्यमुनी श्री महावीरकुमार जी ने कहा ज्ञान के बिना चरित्र नहीं मिलता। सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के योग से व्यक्ति भवसागर को पार कर सकता है। ज्ञान से तत्व जाने जाते हैं, दर्शन से उस पर श्रद्धा होती हैं, चरित्र के द्वारा आश्रवों का निरोध करते है और तप के द्वारा अपनी आत्मा की विशुद्धि करते है। 
साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभा ने तेरापंथ की दीक्षा के बारे में बताते हुए कहा की अहंकार ममकार विसर्जन का नाम है दीक्षा। तेरापंथ धर्मसंघ में एक गुरु की आज्ञा में साधु साध्वीयाँ चलते हैं। दीक्षा से पूर्व पारमार्थिक शिक्षण संस्थान में रहकर अपने वैराग्य की पुष्टि करते हैं, ज्ञान का विकास करते हैं एवं गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना से समर्पित होते हैं।
मुख्यनियोजिका साध्वी श्री विश्रुतप्रभा ने कहां की संयम जीवन को ग्रहण कर अपने जीवन के लक्षित मार्ग को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। अपनी आत्मा की उज्ज्वलता, निर्मलता बढ़ाने, कषायों की परत को हटाकर भीतर के आनंद को प्राप्त करने के लिए दीक्षा ली जाती हैं।
मुमुक्षु प्रेक्षा व मुमुक्षु श्वेता ने दीक्षार्थिनी बहनों का जीवन परिचय प्रस्तुत किया। पारमार्थिक शिक्षण संस्था की ओर श्री मोतीलाल जीरावाला ने आज्ञापत्र का वाचन किया। तीनों दीक्षार्थियों के पिता श्री मदनलाल आच्छा, श्री किशोचन्द सुराणा व श्री अनिलकुमार सेठिया ने आज्ञापत्र श्रीचरणों में समर्पित किये।
इससे पूर्व महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को अयनावरम् से विहार कर पेरम्बूर स्थित बिन्नी मील, नार्थ टाउन पधारने पर उपस्थित हजारों की जनमेदनी ने आपका भावभीना स्वागत अभिनन्दन किया। श्री मेघराज लुणावत, श्रीमती निर्मला गोलेच्छा, श्री सम्पतमल सेठिया, मूर्तिपूजक समाज के श्री प्रकाश कांकरिया व स्थानकवासी समाज से श्री कमल छाजेड़ ने अपने भावोंं के द्वारा पूज्य प्रवर की अभिवन्दना की। नार्थ टाउन महिलाओं ने गीत का संगान किया।
दीक्षा से पूर्व तीनों मुमुक्षु बहनों ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हम गुरू के पद चिन्हों पर चलने को उपस्थित है। हम जिस लक्ष्य को लेकर संघ में समर्पित हो रहे हैं, उसमें उतरोत्तर प्रगति कर कषायों को क्षीण कर मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर बने। 

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