संघ में संघ के तरीक़े से रहना चाहिए - आचार्य श्री महाश्रमण जी

● अध्यात्म की साधना में मोक्ष गंतव्य हैं
● आत्मा रूपी घड़े में रोज़ तप का संचय करना चाहिए
● चतुर्मासिक चतुर्दशी पर लेख पत्र का हुआ वाचन
दिनांक - 15 जुलाई 2019, सोमवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक), JTN, पूज्यप्रवर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने बैंगलुरु की धरा पर धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फ़रमाया की ज्ञान दर्शन चारित्र और तप ये चार मार्ग मोक्ष की ओर ले जाने में सहायक है । गति - गंता और गंतव्य में मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है, सन्मार्ग -उन्मार्ग दो मार्ग है। सन्मार्ग पर चलने से सदगती और उन्मार्ग पर चलने से दुर्गति निश्चित है। हमें किसी गाँव जाना है तो मार्ग तय  करना ज़रूरी हैं, गंतव्य यदि निर्धारित है तो गति गंतव्यानुसार हो। जाना कही है और मंजिल का पता नही तो कहाँ जाएँगे। इसी प्रकार अध्यात्म की साधना का मोक्ष गंतव्य है, और उसका मार्ग है ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप।
मार्ग सही दिखाने के लिए मार्गदर्शक भी चाहिए। अध्यात्म के क्षेत्र में अर्हत भगवान हमारे मार्गदर्शक है और उनके प्रतिनिधि आचार्य भगवंत, साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका जो भी सही राह दिखाए वो मार्गदर्शक हो सकता है। अब मार्ग है मंजिल है पर उस पर चलने से ही काम होगा। आचरण करो तो पूरी बात बने। मार्ग का बोध हो जाने के बाद गति होनी चाहिए, तभी तो गति करनेवाला गंता गंतव्य तक पहुँच पाएगा।
आगम में कहा गया है -चतुर्दशी और उसमें भी चातुर्मासिक चतुर्दशी महत्वपूर्ण है, साधु साध्वियों की अनिवार्यता से उपस्थिति रहती है, प्राचीन काल में आज के दिन उपवास भी करते थे।
पूज्यप्रवर ने आचार्य श्री कालूगणी को याद करते हुए फरमाया कि वे भी आज के दिन सम्भवतः उपवास करते थे। चातुर्मास का महत्व है पर्युषण महापर्व, दसलक्षण पर्व, -न्हवाह्निक अनुष्ठान, दीपावली, महावीर भगवान निर्वाण दिवस आदि पर्व साथ ही साथ तेरापंथ धर्मसंघ से जुड़े आचार्यों से जुड़े दिवस भी चातुर्मास में आते है, इसलिए चातुर्मास के चार, कभी कभी पाँच महीने महत्वपूर्ण है।
आगम में कहा गया है - काव्य नाटक, साहित्य में नाटक श्रेष्ठ है।  नाटक में अभिज्ञान, शाकुंतलम श्रेष्ठ, उसमें भी चौथा अंक श्रेष्ठ और चौथे अंक में भी चार श्लोक महत्वपूर्ण है। ज्ञानाराधना की प्रेरणा देते हुए पूज्यप्रवर ने इस वर्ष महाप्रज्ञ शताब्दी वर्ष पर सबको सम्बोधी सीखने की प्रेरणा दी तथा इन चार महीने में ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान आराधना हेतु प्रेरित किया। तत्वज्ञान, पच्चीस बोल, प्रतिक्रमण आदि सीखना चाहिए। मुख्य प्रवचन सुनना एवं साथ - साथ सामयिक की साधना भी ज्ञानाराधना में सहायक बन सकेंगे। 
विभिन्न संस्थाओं द्वारा विभिन्न पाठ्यक्रम से जुड़े और आजकल तो टेक्नोलोजी का ज़माना है, मीडिया का युग है, घर बैठे ज्ञान सीख सकते है। वीडियो कांफ्रेंसिंग द्वारा भी पढ़ाई की जा सकती है। फिज़िकली ना पहुँच सके तो पत्राचार से आदि साधन से भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता हैं। इस प्रकार ज्ञान की आराधना की जा सकती है। 
दर्शन करने आदि से सम्यक़्तव दृढ़ होता है, गुरुधारणा की जा सकती है। परिवार में भी सम्यक्त्व दीक्षा हो तो दर्शानाराधना की श्रद्धा पुष्ट होती हैं।
साधु-साध्वी बनना, दीक्षा लेना, चारित्र की साधना से बारह व्रतों के धारण से, देश विरति त्याग भी चारित्र आराधना का एक मार्ग है। 
तप के अनेक प्रकार है तन को तपाना, स्वाध्याय-ध्यान-विनय से भी तपाराधना की जा सकती हैं। रात्रि भोजन का त्याग नवकारसी, पोरसी, एकासन आदि भी किया जा सकता है।
चातुर्मासिक चतुर्दर्शी पर पूज्यप्रवर ने लेख पत्र का वाचन करते हुए महामना भिक्षु द्वारा प्ररूपित धर्मसंघ की संगठांत्मक मर्यादा प्रदान करने हेतु उपकार माना। मर्यादाएँ धर्मसंघ की आधार शीला है, गण एकता के स्तम्भ समान है। इन मर्यादाओं का पूर्ण पालन संघ के प्रति मन में कोई शंका नही कोई बात की जानकारी के अभाव में केवली पर छोड़ देना चाहिए। बहस नही करनी चाहिए। हम सब पूरे ज्ञानी तो नही, बस यही मानना है कि यह अपने संघ की मान्यता है, बाक़ी जो सत्य है वो केवली जाने। जब तक केवल ज्ञानी ना बने तब तक पढ़ते रहे। उलझन से बचते रहे। संघ में संघ के तरीक़े से रहना चाहिए। सही कारण का सही निवारण हो सकता है, कारण कोई और दिखाने के लिए सिद्धांत की बातें, यह नही होना चाहिए। आचार जितना शुद्ध रहे, साफ़ रहेगा, मन में छलना नही रहेगी । पूज्य गुरुदेव ने जयाचार्य द्वारा रचित गीतिका—-नंदनवन भिक्षु गण में बसो .. का संगान किया।
रोज़ थोड़ा थोड़ा संचय यानी आत्मा रूपी घड़े में रोज़ तप का संचय करना चाहिए। जैसे मिट्टी के गुल्लक रूपी आत्मा में तप के सिक्के डालते जाए तो मोक्ष जाने हेतु काम आ सकता है नही तो वहाँ पूछेंगे क्या काम किया आगे क्या उत्तर देंगे। अपनी अगली गति कर्मों के आधार पर साधना के पर गति मिलती है। 
मुनि ऋषि कुमार जी ने लेख पत्र का प्रथम पत्र गुरुदेव के पूछने पर धर्मसंघ में सुनाया। नव दीक्षित सभी साध्वियों ने सभी साधुओं को विधिवत वंदना की । मुनि श्री धर्मरुचि जी , साध्वीवर्या जी ने नव दीक्षित साधुओं के उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना की । श्रमण संस्कृति संकाय के महालचंद बेंगानी अपने वक्तव्य के साथ तपस्या के प्रत्याख्यान हुए। मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने संचालन किया। 
अधिक संख्या में साधु-साध्वी २३७ लाड़नु २०१३ के चातुर्मास में थी । इन ५ वर्षों में दक्षिण की यात्रा में बेंगलोर में १७७ साधु साध्वी है। प्रतिदिन- मुख्य प्रवचन ९ बजे से १०-३० बाद मंगलपाठ। प्रतिदिन साध्वीवर्या जी द्वारा उपदेश व्याख्यान आख्यान दिया जा सकेगा। आचार्यप्रवर का इस वर्ष सम्बोधी पर मूलतः प्रवचन भाषण आदि देने का भाव है । प्रति रविवार ६-१२ वर्ष के बालक बालिकाओं के लिए कक्षाए, मध्याह्न में बाइयों के लिए, रात्रि में ८-९ बजे तक उपदेश । पूज्य प्रवर ने सबको मुख्य प्रवचन सुनने की प्रेरणा दी , इस वर्ष ज़्यादा से ज़्यादा श्रावक सम्बोधी सीखे इसकी भी प्रेरणा प्रदान की।

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