"ऋषभदेव ने अपना लौकिक व लोकोत्तर कर्तव्य निभाया" - आचार्य श्री महाश्रमण

आचार्य महाप्रज्ञ शताब्दी वर्ष के अवसर पर आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा रचित "संबोधि" ग्रन्थ के वाचन का पूज्यप्रवर द्वारा हुआ शुभारम्भ

दिनांक - 17 जुलाई 2019, बुधवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) , आचार्य तुलसी महाप्रज्ञ अध्यात्म साधना केंद्र परिसर के महाश्रमण समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए अमृत की वर्षा करने वाले अमृत पुरुष आचार्य श्री महाश्रमण जी ने भगवान ऋषभ का स्मरण करते हुए फरमाया कि भगवान ऋषभ इस अवसर्पिणी की तीर्थंकर परम्परा के 24 तीर्थंकरों में आदि तीर्थंकर थे, प्रथम तीर्थंकर थे । उनकी स्तुति में छोटा ग्रंथ रूप भक्तामर स्तोत्र आचार्य मानतुंग द्वारा रचित अपने प्रथम शब्द भक्तामर के नाम से प्रचलित है । जैसे उक्कीठणं पाठ अपने पहले शब्द "लोगस्स" के नाम से प्रचलित हैं। भगवान ऋषभ ग्रहस्थ थे, राजा थे, तीर्थंकर थे और उन्होंने अपना हर एक कर्तव्य निभाया ।
उन्होंने अपना गृहस्थ जीवन भी अच्छा जीया और सभी को जीवन जीने का प्रशिक्षण भी दिया । राजा थे, कर्तव्य था, जनता की भलाई का तो उनका लौकिक भला भी किया, असि-मसि-कृषि आदि कलाएँ सिखाई, यह सावद्य कार्य था, वे जानते थे फिर भी गृहस्थ थे और उसका धर्म निभाया। सभी को सामान्य जीवन जीने की कला सिखाई, ताकि सब अपना जीवन ज्ञापन अच्छे से कर सके।
अपनी चिर परिचित शैली में आगे बढ़ते हुए पूज्य प्रवर ने फ़रमाया कि भगवान ऋषभ फिर साधु बने, साधना की और कर्मक्षय कर तीर्थंकर बने, पर जब वे गृहस्थ थे, उनका परिवार था, १०० पुत्र थे, भरत-बाहुबली आदि । एक बार भगवान के पास उनके ९८ पुत्र आए, बड़े भाई भरत की शिकायत लेकर कि उनके बड़े भाई ने उनका राज्य छीन लिया, भरत ने उनके साथ अन्याय किया। ऋषभ बोले की जो तुम राज्य माँग रहे हो वो देना मेरे कार्यक्षेत्र में नही क्योंकि सावद्य चर्या का त्याग कर चुका हूँ, पर मै तुम्हें आध्यात्मिक राज्य दे सकता हुँ, जो तुमसे कोई नही छीन सकता । इस प्रकार भगवान ऋषभ ने अपने पुत्रों को आध्यात्मिक राज्य देने का वचन दिया। वह राज्य है संबोधि, तुम संबोधि बनो, बुद्ध बनो, बोधि को प्राप्त करो। संबोधि दुर्लभ है और यह मनुष्य जन्म में सुलभता से मिल सकेगी, आगे मिलना असम्भव है, मनुष्य जन्म की रात्रि बीत गयी, समय बह गया जो वापस नही आएगा, वाणी का लाभ उठाओ।  समय कह गया सो कह गया, रह गया सो रह गया। इसका लाभ उठाओ, संबोधि प्राप्त करो, उससे मोक्ष का राज्य मिल सकेगा, फिर वह राज्य तुमसे कोई नही छीन सकता। अपने ९८ पुत्रों को बोध दिया प्रेरणा दी और संबोधि का राज्य दिया।
तीन प्रकार के मनुष्य की प्रकृति - ऋषभ के बाद २2 तीर्थंकर हुए पार्श्वनाथ और सभी फिर महावीर। ऋषभ के समय इन २२ तीर्थंकर के समय और भगवान महावीर के समय सबकी प्रकृति अलग-अलग थी। भगवान ऋषभ के श्रावक-श्राविका, साधु-साध्वी सरल प्रकृति के थे, सीधे थे,  ऋजु थे, कम समझ वाले थे, वही भगवान महावीर के समय अलग साधु थे, वे वक्रजड़ वेक थे, तार्किक थे, ज़्यादा होशियार कुटिल आदि थे, वही २२ तीर्थंकरों के साधु बहुत प्राज्ञ थे, ऋजु थे, अच्छे थे। भगवान महावीर ने ग्राहस्थ छोड़ा, साढ़े बारह वर्ष तक विशेष साधना की । तीर्थंकर बने, परिवार बढ़ा, शिष्य-शिष्याएँ, साधु-साध्वी, गणधर आदि की संख्या बढ़ी । जैसा कि पहले भी कहा की हर मनुष्य की समझ एक समान नही होती, किसी की कम तो किसी की अधिक। हज़ारों की शिष्य संपदा थी ।
भगवान महावीर अपने साधना काल में विचरते विचरते राजगृही पधारे, राजगृही तो जैसे भगवान महावीर का कृपा पात्र क्षेत्र था। भगवान की वाणी से कई दीक्षित होते परिवार बढ़ता गया, उन्ही नूतन दीक्षित साधु में एक मेघकुमार नाम के साधु थे, जिनके साथ पश्चिम रात्रि में कुछ घटना घटी और वे विचलित हो गए, उनके भगवान महावीर ने संबोध दिया, प्रतिबोध दिया । उन्ही बात का आधार है, यह आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित ग्रंथ सम्बोधि ।
सम्बोधि- आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा रचित ग्रंथ इस वर्ष बैंगलोर चातुर्मास के प्रवचन का मुख्य आधार । आचार्य महाप्रज्ञ जी के शताब्दी वर्ष में उनके स्मरण का आधार बनेगा । इतनी विनम्र एवं वात्सल्य सोच के धनी तेरापंथ सरताज ने गुरु को स्मरण करते हुए बात आगे बढ़ाई... सम्बोधि में कुल १६ अध्याय है, जिनका प्रवचन में सविस्तार व्याख्या करने का भाव है। नतमस्तक हूँ गुरुदेव महाप्रज्ञ के प्रति उनको स्मरण वंदन करते हुए, आज शुभारम्भ कर रहा हूँ ।
मंगल से प्रारम्भ इस सम्बोधि का प्रारम्भ भी मंगल मंत्र से है, पहले श्लोक के पहले अक्षर में ही बीज मंत्र । ॐ-- एक ऐसा शब्द जिसमें जैन धर्म के अनुरूप पंच परमेष्ठि का समावेश है। अरिहंत का अ, सिद्ध-अशरिरी का अ, आचार्य का आ, उपाध्याय का उ, मुनि का म, इस प्रकार ॐ ।
इस संबोधि के माध्यम से आचार्य महाप्रज्ञ जी फ़रमाते है कि भगवान महावीर जो राजगृही पधारे थे, वे कैसे थे - तो भगवान महावीर त्राता थे, त्राणदाता थे, त्रिलोकि के त्राता थे । स्वर्ग-पाताल-नरक इन तीनो के त्राता । त्राता की व्याख्या करते हुए पूज्यप्रवर फ़रमाते है की त्राता जो अहिंसक होता है और भगवान महावीर तो अहिंसा के अवतार थे, वे सबके त्राता, सबके रक्षक थे । अब प्रश्न ये है की वे कैसे त्राता थे - तो वे तीन लोक के प्राणियों की पापों से बचाने वाले त्राता थे, जिनके कारण मनुष्य तिर्यंच स्वर्ग यहाँ तक की नारकी के जीव भी कुछ क्षण उनके कल्याणक से जुड़े, उस समय के लिए सूखानुभूति करते थे । वे तीर्थंकर थे, तीर्थ  स्थापना करने वाले चतुर्विध धर्मसंघ की स्थापना साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका का। तीर्थंकर यानी प्रवचनकार यानी प्रवक्ता जैन धर्म के आधिकारिक प्रवचनकार थे। वे महान थे, राग द्वेष रहित वीतराग थे । विशेष महान पुरुष थे, जिनका नाम वर्धमान केवल नाम से नही ज्ञान दर्शन संपदा से वृद्धिगत थे । ज्ञान दर्शन के वर्धमान थे, जन्मे जब मती-श्रुत ज्ञान दीक्षित हुए तब अवधि और साधना काल में केवलज्ञान । वे नाम से ही नही गुणवत्ता से भी वर्धमान थे।
नवरत्नी बाई देरसरिया ने 37, शर्मिला भंसाली ने 24 के प्रत्याख्यान किए । जसराज जी बुरड ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी । 
आचार्य महाश्रमण चातुर्मास व्यवस्था सामिति द्वारा प्रकाशित पावस प्रवास का विमोचन हुआ और पुस्तक की प्रथम प्रति व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों द्वारा पूज्यप्रवर को भेंट की गई ।

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