आध्यात्मिक सुख ही सच्चा सुख - आचार्य श्री महाश्रमण जी

दिनांक - 24 जुलाई 2019, बुधवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) : ABTYP JTN, अमृत पुरुष आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित सम्बोधि के दूसरे अध्याय के चतुर्थ श्लोक के बारे में सुख-दुःख की मीमांसा करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फ़रमाया कि - सुख दो प्रकार के होते है - एक पौदगलिक, दूसरा आध्यात्मिक, दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है कि एक भौतिक सुख है, एक आत्मिक सुख और तीसरे शब्द में यूँ भी कह सकते है, एक लौकिक और दूसरा लोकोत्तर। 
सुख छोड़कर दुःख अपनाना ये बात मुनि मेघ को समझ नही आई तो उसने भगवान महावीर से प्रश्न किया कि भग़वन आदमी को सुख स्वाभाविक सा लगता है और दुःख अप्रिय तो सुख को ही क्यों ना अपनाए? इस बात का समाधान देते हुए प्रभु महावीर बताते है कि सुख पुदग़लों से शिष्ट होता है, पुदगल जन्य होता है, पदार्थ जन्य होता है, वह वस्तुतः दुःख होता है और मोहयुक्त है इसलिए आदमी को गर्त में ले जाता है। पहले जो सुखानुभूति है, उसका परिणाम अंत में दुःख ही है, इंद्रियों के विषयों से भोग से दुःख ही है, पाप की आत्मा को प्रारम्भ में सुख लगता है, पर बाद में दुःख ही दुःख होता है। भगवान महावीर मेघ को समझाते है की पुदगल द्वारा प्राप्त सुख शुरू में अच्छा लगता है पर आगे दुःख मिलता है। मोह लिप्त व्यक्ति आसक्त हो जाता है ।
पूज्यप्रवर ने किंपाक़ फल का उदाहरण देते हुए बतलाया कि किंपाक फल दिखने में कितना सुंदर और स्वाद में भी बढ़िया होता है पर उसे खाने से परिणाम मृत्यु होता है। ज़हर कितना ही मीठा क्यों ना हो, अंत तो कर देता है। 
आगम में भी कामभोगों के बारे में कहा गया है की ये विषयों के सुख क्षण मात्र है और बहुत काल तक दुःख देने वाले होते है। ये संसार की मुक्ति से विपरीत है, मोह थोड़े से सुख का आकर्षण है, पर परिणाम कष्टप्रद है। भगवान महावीर मुनि मेघ को संबोध प्रदान करते हुए अध्यात्म की बात बता रहे है की साधु जीवन में परिसह है पर अंत सुखद है।
पूज्यप्रवर ने श्रावक - श्राविकाओं, उपासक उपासिकाओं को प्रतिबोध देते हुए आगे फरमाया की जीवन में किसी भी पदार्थ का अति होना हानिकारक है । आगम में एक दृष्टांत आता है, एक राजा आम के फल के प्रति बहुत आसक्त था, दिन-रात, सुबह-शाम बारह मास आम से सेवन से राजा को विभिन्न बीमारियों ने घेर लिया, वैध के निषेध करने पर राजा ने अपनी तबियत सुधारी, परंतु कुछ दिन बाद फिर से आम के सेवन करने से राजा का प्राणांत हो गया। संयम न रख पाने के कारण वे मृत्यु को प्राप्त हुए। इसलिए संयम रखना चाहिए । यही जीवन के लिए अभीष्ट है।
श्री हस्तिमलजी हिरण स्वयंसेवक संघ के सदस्य ने अपने विचार रखे। श्रीमती भीखी बाई, श्री प्रकाश गांधी ने मासखमण के प्रत्याख्यान किए । कुशल मंच संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया ।

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