कोई कटु या गलत बोले तो भी तो शब्दों के प्रति द्वेष नहीं करना चाहिए - आचार्य श्री महाश्रमण जी

महासभा के त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का भव्य शुभारम्भ

देश-विदेश के 242 सभाओं के 764 प्रतिनिधि पहुंचे महाश्रमण दरबार
 तेरापंथ समाज की शक्ति है महासभा : आचार्यश्री महाश्रमण 

10.08.2019 कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की ‘संस्था शिरोमणि’ जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के त्रिदिवसीय सम्मेलन का भव्य शुभारम्भ महातपस्वी, शांतिदूत, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी से महासभा के पदाधिकारियों व सैंकड़ों प्रतिनिधियों के मंगलपाठ श्रवण के पश्चात् हुआ। महासभा द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में इस वर्ष देश-विदेश के 242 सभाओं से कुल लगभग 764 प्रतिनिधि संभागी बने हैं। प्रातः लगभग 8.11 बजे महासभा के पदाधिकारीगण और सभाओं के सैकड़ों प्रतिनिधि आचार्यश्री के प्रवास स्थल में उपस्थित हुए तो आचार्यश्री ने मंगलपाठ सुनाया और मंगल आशीष प्रदान की।
आचार्यश्री ने ‘महाश्रमण समवसरण’ में पाथेय हेतु उपस्थित महासभा के पदाधिकारियों, सभाओं के प्रतिनिधियों तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने ‘सम्बोधि’ व्याख्यानमाला के माध्यम से पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी कभी राग में तो कभी द्वेष में चला जाता है। राग की भावना साधना में बाधक है तो द्वेष की भावना भी साधक के लिए बाधक बनती है। आदमी को विषयों के प्रति द्वेष का भाव करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। ‘सम्बोधि’ में बताया गया कि जो आदमी विषयों के प्रति द्वेष का भाव रखता है वह शोक सम्पन्न बन जाता है, दुःख में चला जाता है। आदमी को कोई कटु या गलत बोले तो भी शब्दों के प्रति द्वेष नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार रूप, गंध, रस और स्पर्श के प्रति भी द्वेष की भावना से बचने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आदमी को अनासक्ति की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने ‘महात्मा महाप्रज्ञ’ के माध्यम से आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के दीक्षा के पश्चात् ज्ञानार्जन के घटना प्रसंगों का सविस्तार वर्णन किया।
आचार्यश्री की पावन सन्निधि में सम्मेलन के संदर्भ में महासभा के अध्यक्ष श्री हंसराज बैताला ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। महासभा के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनिश्री विश्रुतकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तत्पश्चात् साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनिश्री द्वारा भी प्रतिनिधियों को उद्बोधित किया गया।
आचार्यश्री ने महासभा द्वारा आयोजित तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के संदर्भ में पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि अकेले व्यक्ति का जीवन कठिन हो सकता है, इसलिए समाज की कल्पना की गई। कलियुग में संगठन में ही शक्ति होती है। महासभा तेरापंथ समाज की शक्ति है। यह एक प्रतिनिधि संस्था है। महासभा से जुड़ी सभाएं अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। महासभा तो एक मजबूत संस्था है। महासभा एक आश्वासन देने वाली संस्था है, जिसे कभी भी कोई भी कार्य दे दिया जाए तो वह उसे पूर्ण कर सकती है, ऐसा विश्वास दिलाने वाली है। महासभा को तो ‘संस्था शिरोमणि’ की डिग्री भी प्राप्त है। महासभा अनेक क्षेत्रों में कार्य कर रही है। उपासक श्रेणी, ज्ञानशाला आदि-आदि अनेकों उपक्रम महासभा के अंतर्गत चल रहे हैं। महासभा निरंतर अच्छा कार्य करती रहे।
अंत में नित्य की भांति अनेक तपस्वियों ने अपनी-अपनी तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया। हुबल्ली समाज द्वारा मर्यादा महोत्सव के बैनर, पेम्पलेट आदि को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया। वहीं अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा आचार्यश्री के समक्ष जैन संस्कारक प्रशिक्षण कार्यशाला के बैनर को लोकार्पित किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी व महासभा के महामंत्री श्री विनोद बैद द्वारा किया गया। 

शुभारम्भ सत्र का आगज सभा गीत से....

इसके पूर्व आचार्यश्री से मंगल आशीष प्राप्त कर महासभा के पदाधिकारी व प्रतिनिधिगण ‘महाश्रमण समवसरण’ में शुभारम्भ सत्र हेतु उपस्थित हुए, जहां सभागीत का संगान हुआ। इसके उपरान्त महासभा के अध्यक्ष श्री हंसराज बैताला द्वारा सम्मेलन के शुभारम्भ की घोषणा की गई तथा श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन किया गया। बेंगलुरु चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मूलचंद नाहर व महासभा के उपाध्यक्ष श्री कन्हैयालाल गिड़िया ने स्वागत वक्तव्य दिया। महासभा के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनिश्री विश्रुतकुमारजी ने प्रतिनिधियों को उत्प्रेरित किया। संयोजन महासभा के महामंत्री श्री विनोद बैद द्वारा किया गया।


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