"साधना का लक्ष्य हो-तिन्नाणं तारयाणं" - आचार्य श्री महाश्रमण जी

नई दिल्ली, 13 अक्टूबर 2014 आज 13वें अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर के अन्तिम दिन एकांत वास की पूर्णता पर आचार्य प्रवर का सानिध्य प्राप्त हुआ। आज मुनि कुमार श्रमण जी ने बताया कि रशिया, स्वीडन, युगांडा व भारत देश के कुल 69 प्रतिभागियों ने भाग लिया। रशिया के Kurgan शहर से आये ग्रुप ने प्रेक्षा गीत का बहुत सुन्दर संगान किया। ज्ञातव्य रहे अकेले कुरगन शहर में लगभग 1000 व्यक्ति प्रेक्षाध्यान करते हैं। यही ग्रुप उन्हें वहां उस अनार्य देश में प्रेक्षा सिखाता है। इसके पश्चात स्वीडन, साइबेरिया व भारत से एक एक प्रतिभागियों ने अपने विचार व्यक्त किये।
प्रेक्षाप्रणेता आचार्य महाश्रमण जी ने उपस्थित शिविरार्थियों व देश के कोने कोने से उपस्थित जन मानस को संबोधित करते हुए फ़रमाया- आर्हत वांग्मय में कहा गया है - "संपिक्खए अप्प ग मप्पएणं" अर्थात अपने से अपने को देखना। हमारे पास आँखे है। हम आँखों से दूसरो को एवं अपने शरीर को भी देखते है। परन्तु भीतर में झांकना व अपनी पहचान करना बड़ी बात है। प्रेक्षा ध्यान साधना स्वयं को देखने की पद्धति है।
 प्रेक्षाध्यान पद्धति की उपसंपदा दिलाई जाती है। उसमें 5 सूत्र बताए जाते हैं। वे 5 महत्वपूर्ण सूत्र इस प्रकार हैं :
1) भाव क्रिया (living action) : भाव क्रिया का मतलब है- वर्तमान में जीना। अभ्यास होना चाहिए कि मन में ज्यादा अनपेक्षित विचार न आए। जो कार्य किया जाए उसमें मन लगे।
2) प्रतिक्रिया विरति: किसी भी चीज की प्रतिक्रिया न करना।
3) मैत्री:प्राणी मात्र के प्रति मंगल मैत्री की भावना रहनी चाहिए। संस्कृत साहित्य में कहा गया
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्।।"
4)मिताहार: आहार का भी संयम हो। सीमा का अतिक्रमण न करें।
5) मितभाषण : वाणी का संयम हो। बोलना जीवन की आवश्यकता है, परन्तु अनावश्यक नहीं बोलना चाहिए। मौन का अभ्यास करना चाहिए।

पूज्यप्रवर ने शिविरार्थियों को कहा कि आज अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर का समापन हो रहा है। शिविर तो बहुत लगते हैं पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर का 13वां शिविर है। प्रेक्षाध्यान को परम पूज्य आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ जी की देन बताते हुए इसे दैनिक जीवन का अंग बनाने की बात कही तथा कहा ध्यान के साथ स्वाध्याय का क्रम अपना कर "तिन्नाणं तारयाणं" के मार्ग पर अग्रसर हों।स्वयं भी तिरें और ओरों को भी तारें।


गुरुदेव ने कहा प्रेक्षाध्यान का यह क्रम निरंतर चलता रहे। वहां जा कर अन्य लोगों को भी सिखाएं। वह दिन धन्य होगा जिस दिन रशिया आदि विदेशों के 4-5 साधू हो जायेंगे। यह असंभव नहीं। इसके लिए पहले भारत आकर कुछ वर्षों तक साधना करनी होगी। तो जीवन में त्याग व समता का विकास हो। प्रवृति पर निवृति का अंकुश रहे तो जीवन संतुलित बन सकता है।आज साध्वी लक्ष्मी कुमारी जी जिनका स्वर्गवास पीलीबंगा में हुआ उनकी स्मृति सभा रखी गई। 4 लोगस्स का ध्यान किया गया। मुनि किशन लाल जी ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन मुनि कुमार श्रमण जी ने किया।

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