पांच अविग्रह के द्वारा संघ हो सकता है स्वस्थ और दीर्घजीवी : आचार्यश्री महाश्रमण

- आचार्यश्री के श्रीमुख से निरंतर बह रही आगमवाणी लोगों को प्रदान कर रही विशेष ज्ञान - आचार्यश्री ने विधेयात्मक और निषेधात्मक आज्ञा सहित पांच अविग्रह का किया वर्णन - संयम पथ पर आगे बढ़ रहे साधु, साध्वियों व समणश्रेणी के प्रति आचार्यश्री ने की आध्यात्मिक मंगलकामना - संयम पर्याय के 25 वर्ष पूर्ण करने वाले साधु, साध्वियों व समणियों ने दी श्रीचरणों में अर्पित की प्रणति 
आचार्यश्री महाश्रमणजी

           12 अक्तूबर 2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को कोलकाता के राजरहाट स्थित चतुर्मास स्थल ‘महाश्रमण विहार’ में बने अध्यात्म समवसरण से लोगों को ‘ठाणं’ आगम के आधार पर संघ को स्वस्थ और दीर्घजीवी बनाने में सहायक पांच अविग्रहों का वर्णन किया। आचार्यश्री ने संयम पर्याय में 25 वर्ष पूर्ण करने वाले साधु, साध्वियों, समण-समणियों के साथ ही आज के दिन विभिन्न वर्षों में प्रवेश करने वाले सभी चारित्रात्माओं के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की और अपने महाव्रतों के पालन के प्रति सतत जागरूक रहने की पावन प्रेरणा प्रदान की। साथ ही महाश्रमणी साध्वीप्रमुखाजी ने अपने सभी को अपने आशीर्वचनों से अभिसिंचन प्रदान किया। 
          गुरुवार को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि ‘ठाणं’ आगम में आचार्य व उपाध्याय को संघ या समूह की एकता, अखंडता को बनाए रखने के पांच अविग्रहों का वर्णन किया गया है। वर्तमान में आचार्य ही उपाध्याय का दायित्व भी संभालते हैं। आचार्यश्री ने पांच अविग्रहों का वर्णन करते हुए कहा कि पहला अविग्रह होता है आज्ञा-धारणा का सम्यक् प्रयोग। आचार्य को विधेयात्मक और निषेधात्मक आदेश देना चाहिए। दूसरी बात होती है बड़े-छोटे के क्रम में वंदन-व्यवहार होना चाहिए। संघ की अखंडता के लिए वंदन-व्यवहार बहुत महत्त्वपूर्ण है। दिन में कम से कम एक बार बड़े संतों को वंदन करने का प्रयास करना चाहिए। इसके प्रति आचार्य को भी जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। 
          तीसरी बात होती है जो सूत्र आचार्य के पास है, उसकी समय-समय पर वाचना प्रदान कर उस सूत्रीय ज्ञान और आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान की आराधना से परंपराएं पुष्ट होती हैं। संस्कृति को सुरक्षित करने के लिए साहित्य का बहुत महत्त्व होता है। चौथी बात आचार्य की सेवा के प्रति चारित्रात्माओं को जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। पांचवी बात कि आचार्य को भी संघ का सम्मान करना चाहिए और विशेष यात्रा आदि संघ से समर्थन लेकर ही करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने इन पांचों का वर्णन करते हुए कहा कि यह पांच सूत्र संघ और संगठन को दीर्घजीवी और अखंड बनाने वाले हो सकते हैं। 
          आचार्यश्री ने अपने मंगल प्रवचन के उपरान्त कहा कि कार्तिक महीने में बहुत से चारित्रात्माओं के संयम पर्याय की बात आती है। आज भी अनेक चारित्रात्माएं 75, 50 अथवा 25 वर्षों तथा अनेक-अनेक वर्षों की सम्पन्नता कर रहे हैं। 25 वर्ष तक के संयम पर्याय करने वाले गुरुकुलवास में भी उपलब्ध हैं। वैसे तो संयम पर्याय का हर वर्ष अच्छा है। चारित्रात्माओं को संयम को उज्जवल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। उनका प्रतिक्रमण अच्छा हो, आगम बत्तीसी का परायण कर ज्ञानार्जन का प्रयास, दसवेंआलियं आदि ग्रंथों को जितना कंठस्थ करने का प्रयास हो, अपने कार्यों आदि का विहंगावलोकन करें तो संयम की निर्मलता बढ़ सकती है, परिपुष्ट हो सकती है। गोचरी करने आदि सभी नियमों के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करने का चाहिए। जागरूकता से ही संयम की निर्मलता बनी रह सकती है। मैं सभी के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना करता हूं। इसके पूर्व साध्वीप्रमुखाजी ने भी संयम पर्याय के 25 वर्ष पूर्ण करने वाले साधु, साध्वियों और समणियों को अपने आशीर्वचनों से अभिसिंचन प्रदान किया। 
          इससे पहले आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अपने संयम पर्याय के 25 वर्ष संपन्न करने वाले चारित्रात्माओं में मुख्यनियोजिका साध्वी विश्रुतविभाजी, मुनि जयकुमारजी, साध्वी जयविभाजी, साध्वी कमलविभाजी, समणी परिमलप्रज्ञाजी, समणी रूचिप्रज्ञाजी, समणी कमलप्रज्ञाजी तथा समणी हंसप्रज्ञाजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी और संयम पथ पर निरंतर अग्रसर होने के लिए अपने आराध्य के समक्ष अपनी विनयांजलि अर्पित की। 









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