गुरू के मनोगत भावों का आराधन शिष्यों का दायित्व : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
28.10.2026, बुधवार, लाडनूं :
-आचार्यश्री माणकगणीजी के महाप्रयाण तिथि पर श्रद्धार्पण
-संतवृंद द्वारा संस्कृत भाषा में प्रस्तुति
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘माणकगणी और संघ की महानता’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि जैन शासन में और विशेषतया श्वेताम्बर तेरापंथ शासन में आचार्य पद का बहुत ऊंचा स्थान है। हमारे धर्मसंघ में सर्वोपरि स्थान पर आचार्यप्रवर होते हैं। संघ की व्यवस्था, संचालन का मुख्य जिम्मा मूलतः आचार्यप्रवर पर होता है। संघ के विकास के लिए भी ध्यान देना, ज्ञानात्मक आराधना के प्रति भी यथायोग्य आयास-प्रयास करना, तात्त्विक चर्चा करना, चिंतन-मनन करना, इस प्रकार आचार्य बहुत जिम्मेदारी का पद होता है।
धर्मसंघ की मुख्य सत्ता आचार्य में केन्द्रित होती है। आगम में भी कहा गया है कि आचार्य का मनोगत भाव अथवा वाग्गत भाव उसको साधु-साध्वियों को जान लेने का प्रयास करना चाहिए और उसे ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए और उसे संपादित करने का प्रयास करें, यह पूर्णता की बात होती है।
आज कार्तिक कृष्णा तृतीया है। हमारे धर्मसंघ के षष्ठ आचार्यश्री माणकगणीजी का वार्षिक महाप्रयाण तिथि है। परम पूजनीय, परम वंदनीय आचार्यश्री माणकगणीजी स्वामी जन्मस्थल जयपुर होता है। बालक माणक के माता-पिता का देहांत हो गया था तो वे अपने बाबा लक्ष्मणदासजी के संरक्षण में बड़ा होने का मौका मिला। एकबार लक्षमणदासजी से श्रीमज्जयाचार्यजी ने फरमाया था कि इस बालक की जब भी दीक्षा की भावना हो तो आप रोकने का प्रयास मत करिएगा। और जायाचार्यश्रीजी के युग में बालक माणक की दीक्षा हो गई। मुनि अवस्था में पहले जयाचार्यश्री का युग और बाद में मघवागणीजी का युग आया। आचार्यश्री मघवागणीजी जब सरदारशहर में विराज रहे थे और उन्होंने शारीरिक कठिनाई के कारण मुनि माणकजी को युवाचार्य बना दिया और उसके तीन दिन बाद उनका महाप्रयाण हो गया। सरदारशहर में युवाचार्यश्री माणकगणजी का आचार्यपद पर आरोहण हुआ। आचार्यश्री माणकगणीजी का कद लम्बा था। संतों को अपने हाथ से ग्रास देने में उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती थी। उन्हें भी बहुत कम समय का कालमान मिला था। आचार्यश्री माणकगणीजी के मन में संघ में कुछ परिवर्तन लाने की योजना थी, ऐसा ज्ञात होता है, किन्तु काल सीमित और उस समय की परिस्थितियां आनुकूल्य नहीं था, इस कारण उन्होंने परिवर्तन नहीं किया। इतिहास बताता है कि वे जयपुर पधारे और वहां चतुर्मास किया।
फिर वे थली के क्षेत्रों की यात्रा कर वि.सं. 1954 का चतुर्मास करने के लिए सुजानगढ़ में पधारे। चौमासे में अच्छा धर्म-ध्यान चल रहा था। उस गांव ज्वर-अतिसार आदि की बीमारी फैली और उसके चपेट में स्वयं आचार्यश्री माणकगणीजी भी आ गए। बीमारी से मानों शरीर क्षीण होने लगा। मुनि मगनजी स्वामी आदि कई संत बात करने के लिए संकोच करते हुए पधारे। उन्होंने आगे युवाचार्यश्री की अर्जी मानों नहीं स्वीकार की। और फिर उनका आज के दिन महाप्रयाण हो गया। नियति को जो मंजूर था, वह ही हुआ। आज के दिन उनका महाप्रयाण हो गया और शासन अनाथ हो गया।
बाद में संतों की गोष्ठी आयोजित हुई और उसमें मुनि कालूरामजी (छापर) को आचार्य के रूप में मनोनीत किया गया। आचार्यश्री ने छठे आचाआचार्यश्रीर्यश्री माणकगणी के महाप्रयाण दिवस के संदर्भ में एक गीत का आंशिक संगान किया।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि हमारे धर्मसंघ के छठे आचार्य के रूप में प्राप्त हुए। परम पूजनीय परम वंदनीय आचार्यश्री माणकगणीजी के प्रति श्रद्धा का अर्पण करता हूं। संतवृंद ने गीत को प्रस्तुति दी। संगीत शिक्षक श्री चटर्जी ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी संगीतमय प्रस्तुति दी। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। अहमदाबाद के चिकित्सा प्रभारी श्री अशोक सेठिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी।