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मनोगुप्तता से होता एकाग्रता का विकास - आचार्य श्री महाश्रमण
गुरुवाणी/ केन्द्र

मनोगुप्तता से होता एकाग्रता का विकास - आचार्य श्री महाश्रमण

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Sanjay Vaidmehta

26/10/2026


-राष्ट्रीय ज्ञानशाला प्रशिक्षक सम्मेलन एवं दीक्षांत समारोह का मंचीय उपक्रम समायोजित

26.10.2026, सोमवार, लाडनूं.  करीब 37 वर्षों बाद तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के दूसरे योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को प्रातःकालीन आयोज्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘मनोगुप्तता से क्या मिलेगा? को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आगम में प्रश्न किया गया कि मनोगुप्तता से क्या मिलेगा?

    मनुष्य जीवन में मन का अपना महत्त्व होता है। मन कभी सुखी बन जाता है और कभी दुःखी भी बन जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य का महत्त्व है तो मानसिक स्वास्थ्य का भी अपना महत्त्व है। शरीर ठीक हो और मन परेशान हो तो अच्छी बात नहीं होती, वह समस्या भी बन सकती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य का भी अपना महत्त्व होता है। मनोबल अच्छा होता है तो शरीर की कोई तकलीफ आ भी जाए तो उसे सहन करना आसान हो जाता है। यदि आदमी का मनोबल कमजोर हो जाए और मानसिक प्रसन्नता न हो तो आदमी छोटी-छोटी चीजों से परेशान होता रह सकता है। प्रश्न हो सकता है कि मन कैसे मजबूत रहे और शांति में रहे?

    शरीर से आदमी अच्छा काम करना चाहता है तो उसके लिए आदमी के मन में भी प्रसन्नता होनी चाहिए। मन प्रसन्न हो तो आदमी 15 किलोमीटर की यात्रा भी कर सकता है और जाकर लौट भी सकता है, लेकिन वही मन न हो, खिन्नता के भाव हों तो आदमी को दो-चार किलोमीटर चलना भी बहुत ही कठिन कार्य प्रतीत होता है। जीवन में मनोनुकूलता का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। आदमी के जीवन में मनोबल और मानसिक प्रसक्ति बनी रहे।

    आदमी भले ही बीमारी में क्यों न हो, मन प्रसन्न है, शांत है तो कठिन कार्य करना भी आसान हो सकता है। साधुओं में मनोबल होता है तो कई बार विहार कर लेते हैं। चिंतन अच्छा होता है, कठिनाई से भी पार पाया जा सकता है। शारीरिक अनुकूलता और मानसिक अनुकूलता दोनों का योग मिल जाए तो बहुत अच्छा कार्य हो सकता है। एकाग्र चित्त वाली जीव अशुभ संकल्पों से रक्षा करने वाला बन सकता है। मनोगुप्तता से एकाग्रता का विकास और अशुभ संकल्पों से मन की रक्षा की जा सकती है तथा संयम की आराधना भी हो सकती है।

    आचार्यश्री की अनुज्ञा से उपासक श्रेणी के संयोजक श्री सूर्यप्रकाश श्यामसुखा ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अंतर्गत संचालित ज्ञानशाला प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय ज्ञानशाला प्रशिक्षक सम्मेलन एवं दीक्षान्त समारोह का दूसरे दिन आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में महासभा के संगठन मंत्री श्री निर्मल गोखरू, ज्ञानशाला के संयोजक श्री सोहनराज चौपड़ा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। थली अंचल की ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया। युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि ज्ञानशाला में प्रशिक्षण देना महत्त्वपूर्ण कार्य है। छोटे बच्चों को अच्छे ज्ञान देना, सीखाना आदि बहुत अच्छा कार्य है। व्यवस्था पक्ष का भी अपना महत्त्व है। ज्ञानशाला में ट्रेनिंग देने वाले भी अच्छे ट्रेण्ड हों तो अच्छी बात होती है। यह उपक्रम खूब अच्छे ढंग से चले, खूब अच्छे विकास का क्रम रहे।